वो तांबे का मुर्ग़ा जो हर तूफ़ान में उल्टा घूमता था
सारांश
केसरपुर गाँव के खलिहान पर लगा सौ साल पुराना तांबे का मुर्ग़ा हर तूफ़ानी रात हवा से उल्टी दिशा में मुड़ जाता है, और सब उसे टूटा हुआ मानते हैं। सूखे से जूझते गाँव में, चौदह साल की मीरा अपने दादा के साथ उस ज़िद्दी चोंच के पीछे चल पड़ती है।
पूरा पाठ
0:00उल्टा मुर्ग़ा
केसरपुर गाँव में एक पुराना खलिहान है। उसकी छत पर बैठा है... तांबे का एक मुर्ग़ा। यह एक मौसम-सूचक है, पूरे सौ साल पुराना। दुनिया का हर मौसम-सूचक, उसी तरफ़ मुँह करता है, जहाँ से हवा आती है। पर यह मुर्ग़ा? हर तूफ़ानी रात, जब आँधी गरजती है, यह ठीक उल्टी तरफ़ घूम जाता है! गाँव वाले कहते हैं, यह टूटा हुआ है। शायद अपशकुनी भी। चौदह साल की मीरा ने यह बात सौ बार सुनी थी। पर उस गर्मी में, उसने पहली बार एक नया सवाल पूछा। अगर यह टूटा नहीं है... तो यह इशारा किस चीज़ की ओर कर रहा है?
0:47सूखता गाँव
उस साल केसरपुर में बारिश रूठ गई थी। खेतों की मिट्टी फट चुकी थी। गाँव में बस एक कुआँ बचा था। और हर सुबह, वह थोड़ा और गहरा लगता था। अब पानी शहर से टैंकरों में आता था। और टैंकर मुफ़्त नहीं आते। फिर पंचायत ने एक फ़ैसला सुनाया। खलिहान का पुराना तांबे का मुर्ग़ा, कबाड़ी को बेचा जाएगा। तांबा महँगा है। और वह टूटा मुर्ग़ा, किसी काम का नहीं। मीरा के दादा, रघु, कुछ नहीं बोले। बस उस शाम, देर तक खलिहान की ओर देखते रहे। कबाड़ी पाँच दिन बाद आने वाला था।
1:34तूफ़ान की रात
तीसरी रात, आसमान काला पड़ गया। पर बारिश नहीं आई। आई बस सूखी आँधी। धूल, बिजली, और गरज! मीरा खिड़की पर बैठी थी। हाथ में था दादा का पुराना पीतल का कम्पास। तभी बिजली चमकी। और उस पल की रोशनी में, मीरा ने देखा... आँधी दक्खिन-पश्चिम से आ रही थी। पर मुर्ग़े की चोंच ठीक उल्टी थी। उत्तर-पूर्व की ओर तनी हुई! मीरा ने कम्पास की सुई देखी, और काग़ज़ पर लिख लिया। पीछे से दादा की धीमी आवाज़ आई। “हर तूफ़ान में, वहीं देखता है, बिटिया। मेरे बचपन से।”
2:21गौरा लोहारिन
“यह किसने बनाया था, दादा?” मीरा ने पूछा। दादा पास आकर बैठ गए। “मेरी दादी ने, गौरा ने। वह गाँव की लोहारिन थी। सौ साल पहले, जब ऐसा ही अकाल पड़ा था।” “लोग कहते थे, गौरा पगला गई है। अकाल था, पेट भरने को अनाज नहीं था। और वह भट्ठी पर बैठी, तांबा पीटती रही। फिर उसने यह मुर्ग़ा खलिहान पर लगाया। और किसी को कुछ नहीं बताया।” मीरा ने काग़ज़ पर बनी उस एक रेखा को देखा। उत्तर-पूर्व। उस तरफ़ खेत थे, सूखा नाला था। और दूर... एक भूरी टेकरी।
3:09तीर के पीछे
अगली सुबह, आँधी थम चुकी थी। मीरा और दादा कम्पास लेकर निकल पड़े। खलिहान से सीधे, उत्तर-पूर्व की रेखा पर। रास्ता आसान नहीं था। कँटीली बाड़ें आईं, तो घूमकर फिर रेखा पकड़ी। सूखा नाला आया, तो किनारे-किनारे चलकर पार किया। हर सौ क़दम पर, मीरा रुकती, और सुई जाँचती। दोपहर तक, वे भूरी टेकरी पहुँच गए। और वहाँ... कुछ नहीं था। बस पत्थरों का एक बेतरतीब ढेर। और उसके पास, एक अकेला पीपल। मीरा का दिल बैठ गया। इतनी दूर आए, बस इस ढेर के लिए?
3:55आख़िरी शाम
गाँव लौटे, तो बात फैल चुकी थी। लड़के हँसे, “टूटे मुर्ग़े के पीछे भागी थी!” और अगली सुबह, कबाड़ी आने वाला था। उस शाम, गाँव के बड़ों ने मुर्ग़े को छत से उतारा। बड़ी सावधानी से, उसे खलिहान के फ़र्श पर रख दिया। मीरा उसके पास बैठ गई, आख़िरी बार देखने। तभी उसे कुछ अजीब दिखा। चोंच के पीछे, तांबे का एक चौड़ा पंख जुड़ा था। और पूँछ पतली थी, हल्की। जैसा होना चाहिए, ठीक उसका उल्टा! हवा हमेशा चौड़े हिस्से को अपने साथ धकेलती है। यानी किसी ने इसे जानबूझकर ऐसा बनाया था। ताकि चोंच, हवा के साथ जाए। और पूँछ के जोड़ के पास, धूल के नीचे... कुछ खुदा हुआ था।
4:52नक़्शा जो आँधी में खुले
मीरा ने धूल पोंछी। वहाँ गौरा के हाथ से खुदे अक्षर थे। “जब आँधी दक्खिन से आए, मेरी चोंच पानी दिखाए।” मीरा जड़ हो गई। केसरपुर में तूफ़ान, हमेशा एक ही दिशा से आते हैं। दक्खिन-पश्चिम से। तो यह मुर्ग़ा, मौसम बताने के लिए बना ही नहीं था! हर तूफ़ानी रात, यह एक ही जगह की ओर मुड़ता है। यह मौसम-सूचक नहीं था। यह एक नक़्शा था... जो सिर्फ़ आँधी में खुलता था। फिर मीरा को वह पीपल याद आया। इस सूखे में, गाँव के आम तक मुरझा गए थे। तो वह अकेला पेड़, हरा कैसे था? अब मीरा मुर्ग़े को बचाना नहीं चाहती थी। वह पानी ढूँढना चाहती थी। और वह भी, कबाड़ी के आने से पहले!
5:49पत्थरों के नीचे
उसी रात, दादा ने गाँव के बड़ों को जगाया। लालटेनें जलीं। और आधा गाँव, भूरी टेकरी पर पहुँच गया। बड़ों ने एक-एक पत्थर हटाया। मीरा लालटेन थामे खड़ी रही। ढेर के नीचे, एक चौड़ी पटिया निकली। उस पर खुदा था... एक छोटा-सा मुर्ग़ा! चार आदमियों ने, लोहे की छड़ों से पटिया सरकाई। नीचे से ठंडी, गीली हवा का एक झोंका उठा। जैसे धरती ने, सौ साल बाद साँस ली हो। लालटेन की रोशनी, पत्थर की सीढ़ियों पर उतरती गई। नीचे... और नीचे... और सबसे नीचे, अँधेरे में, कुछ चमका। पानी! साफ़, हिलता हुआ, बहता हुआ पानी। उस पर लालटेन की लौ, तांबे जैसी झिलमिला रही थी। किसी ने कुछ नहीं कहा। बस पानी की धीमी कलकल, सुनाई देती रही।
6:52गौरा का राज़
अगले दिन, पंचायत के पुराने रजिस्टर खोले गए। पीले पन्नों पर लिखा था... उन्नीस सौ पच्चीस के अकाल में, गौरा लोहारिन ने एक सोता ढूँढा था। टेकरी के नीचे। उसी पानी ने, पूरे गाँव को बचाया था। बरसों बाद, गाँव में नहर आई। तब किसी ने सोते की ज़रूरत नहीं समझी। बच्चों की सुरक्षा के लिए, बावड़ी को पत्थरों से ढक दिया गया। और धीरे-धीरे, सब भूल गए। सब... सिवाय गौरा के। वह जानती थी, लोग भूल जाएँगे। इसलिए उसने अपनी याद को, तांबे में ढाल दिया। और उसे ऐसी जगह टाँग दिया, जहाँ हर तूफ़ान उसे दोहराए। फिर कबाड़ी आया... और ख़ाली हाथ लौट गया।
7:44फिर वही आँधी
कुछ हफ़्तों बाद, जानकारों की मदद से सोता साफ़ किया गया। उस पर जाली लगाई गई। और गाँव के नल, फिर से भरने लगे। तांबे का मुर्ग़ा, वापस खलिहान की छत पर लौट आया। फिर एक रात, आँधी आई। सारे पेड़ झुक गए। और मुर्ग़ा, फिर उल्टा घूम गया। मीरा के पास एक छोटा बच्चा खड़ा था। उसने पूछा, “दीदी, यह टूटा हुआ है न?” मीरा मुस्कुराई। “नहीं। यह हवा के ख़िलाफ़ नहीं मुड़ता। यह बस, भूलने के ख़िलाफ़ मुड़ता है।” और ऊपर, बिजली की चमक में, तांबे की चोंच तनी रही। उसी दिशा में... जहाँ सौ साल से, चुपचाप, पानी इंतज़ार कर रहा था।
अन्य भाषाओं में
- English: The Weathervane That Pointed Against the Wind
- संस्कृतम्: वायोः विपरीतः बाणः — विस्मृतस्य उत्सस्य रहस्यम्
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