लिफ्ट को कैसे पता चलता है कि किस मंज़िल पर रुकना है?
सारांश
एक कार जितना भारी डिब्बा हर बार ठीक आपकी मंज़िल के बराबर कैसे रुकता है? आइए, कल्पना में लिफ्ट की सुरंग के अंदर चलें और मिलें गूँथी हुई स्टील की रस्सियों, संतुलन वाले काउंटरवेट, ताक़तवर मोटर और मंज़िलें गिनने वाले होशियार सेंसरों से।
पूरा पाठ
0:00लिफ्ट का रहस्य
सोचिए... आप एक डिब्बे में खड़े हैं। यह डिब्बा एक छोटी कार जितना भारी है। और यह हवा में ऊपर उठता जा रहा है! फिर अचानक यह रुक जाता है। ठीक आपकी मंज़िल के फ़र्श के बराबर। बाल भर का भी फ़र्क नहीं! क्या आपने कभी सोचा है... लिफ्ट को कैसे पता चलता है कि कहाँ रुकना है? उसकी आँखें तो हैं नहीं। उसके पास नक्शा भी नहीं है। फिर भी वह हर बार सही जगह रुकती है। वो भी दिन में सैकड़ों बार! आज हम एक बहुत ख़ास सफ़र पर चलेंगे। लिफ्ट के अंदर नहीं, उसके पीछे छिपी लंबी सुरंग में। हम वहाँ अपनी कल्पना से झाँकेंगे। असली कमाल तो वहीं होता है। और मज़े की बात पता है? यह जादू नहीं, विज्ञान है! तो कल्पना की सीट बेल्ट बाँध लीजिए। क्योंकि सबसे पहले जो दिखेगा... वह आपको हैरान कर देगा!
1:07शाफ़्ट और पटरियाँ
हमारा सफ़र शुरू होता है लिफ्ट की सुरंग से। इसे शाफ़्ट कहते हैं। यह एक लंबी, सीधी, खड़ी सुरंग है। इमारत के सबसे नीचे से, सबसे ऊपर तक। असल में यहाँ सिर्फ़ प्रशिक्षित मैकेनिक ही जाते हैं। इसलिए हम इसे बस कल्पना में देखेंगे। अब दीवारों को ध्यान से देखिए। दोनों तरफ़ लंबी स्टील की पटरियाँ लगी हैं। बिल्कुल रेल की पटरी जैसी... पर खड़ी! इन्हें गाइड रेल कहते हैं। लिफ्ट का डिब्बा छोटे पहियों से इन पर सरकता है। इसीलिए लिफ्ट न दाएँ झूलती है, न बाएँ डोलती है। वह बस सीधी ऊपर जाती है, और सीधी नीचे। जैसे ट्रेन अपनी पटरी पर चलती है। वाह-तथ्य सुनिए! दुनिया की कुछ सबसे ऊँची इमारतों में, लिफ्ट सौ से भी ज़्यादा मंज़िलें तय करती है! पर रुकिए... डिब्बे के ऊपर कुछ चमकदार चीज़ें लटक रही हैं। चलिए देखें, ये क्या हैं?
2:17स्टील की रस्सियाँ
ये हैं लिफ्ट की स्टील की रस्सियाँ! दूर से ये मोटी डोरी जैसी दिखती हैं। पर ज़रा पास से देखिए। हर रस्सी बहुत सारे पतले स्टील के तारों से बनी है। इन तारों को आपस में गूँथा जाता है। बिल्कुल वैसे, जैसे बालों की चोटी बनाते हैं। पहले पतले तार मिलकर एक लड़ी बनाते हैं। फिर कई लड़ियाँ साथ घुमाई जाती हैं। और बन जाती है पूरी रस्सी! इस तरह गूँथने से रस्सी बहुत मज़बूत बनती है। और आसानी से मुड़ भी जाती है। अब सुनिए वाह-तथ्य! ज़्यादातर लिफ्टों में एक नहीं, कई रस्सियाँ होती हैं। और अक्सर अकेली एक रस्सी भी पूरा डिब्बा संभाल सकती है! यानी बाकी रस्सियाँ अतिरिक्त मदद के लिए हैं। जैसे टीम में एक्स्ट्रा खिलाड़ी। पर एक सवाल है। ये रस्सियाँ ऊपर जाकर कहाँ ख़त्म होती हैं? जवाब सुनकर आप चौंक जाएँगे। रस्सी का दूसरा सिरा... एक छिपे हुए दोस्त से बँधा है!
3:32काउंटरवेट से मिलिए
मिलिए लिफ्ट के छिपे हुए दोस्त से! इसका नाम है काउंटरवेट। यानी संतुलन का भार। यह भारी धातु के टुकड़ों का ऊँचा ढेर है। ये टुकड़े एक फ्रेम में रखे होते हैं। यह शाफ़्ट में डिब्बे के पीछे चलता है। अपनी अलग पटरियों पर। रस्सी का एक सिरा डिब्बे से बँधा है। और दूसरा सिरा इस काउंटरवेट से। जब डिब्बा ऊपर जाता है, काउंटरवेट नीचे आता है। जब डिब्बा नीचे आता है, काउंटरवेट ऊपर जाता है। जैसे दोनों साथ में झूला झूल रहे हों! क्या आपने पार्क में सी-सॉ देखा है? अगर दोनों तरफ़ लगभग बराबर वज़न हो, तो उसे ऊपर-नीचे करना बहुत आसान होता है। काउंटरवेट भी यही करता है। इसका वज़न खाली डिब्बे से थोड़ा ज़्यादा रखा जाता है। लगभग खाली डिब्बे और आधे यात्रियों के वज़न जितना। वाह-तथ्य! इसी चालाकी से मोटर को बहुत कम मेहनत करनी पड़ती है। और ढेर सारी बिजली बचती है! पर इस झूले को चलाता कौन है? चलिए, शाफ़्ट के सबसे ऊपर चलते हैं।
4:55मोटर और पहिया
शाफ़्ट के सबसे ऊपर बैठा है लिफ्ट का ताक़तवर इंजन। कभी-कभी यह पास के एक कमरे में भी होता है। यह है बिजली की मोटर! मोटर के साथ एक बड़ा पहिया लगा होता है। उसकी किनारी पर गहरी नालियाँ बनी होती हैं। स्टील की रस्सियाँ इन नालियों में बैठती हैं। और पहिये के ऊपर से गुज़रती हैं। एक तरफ़ डिब्बा लटका है। दूसरी तरफ़ काउंटरवेट। जब मोटर पहिया घुमाती है, तो रस्सियाँ उसे कसकर पकड़ लेती हैं। और साथ-साथ चल पड़ती हैं। पहिया एक तरफ़ घूमे, तो डिब्बा ऊपर। दूसरी तरफ़ घूमे, तो डिब्बा नीचे। कितना सीधा-सादा, है ना? वाह-तथ्य! कुछ तेज़ लिफ्टें एक मिनट में कई सौ मीटर ऊपर पहुँच जाती हैं! पर मोटर तो बस घूमना जानती है। उसे कौन बताता है कि कब चलना है, और कब रुकना है? इसके लिए लिफ्ट के पास है... एक दिमाग़!
6:05लिफ्ट का दिमाग़
लिफ्ट का दिमाग़ एक छोटा-सा कंप्यूटर है। इसे कंट्रोलर कहते हैं। जब आप बाहर का बटन दबाते हैं, या अंदर अपनी मंज़िल का नंबर दबाते हैं, तो एक छोटा-सा बिजली का संदेश जाता है। सीधा इस दिमाग़ तक! कंट्रोलर सारे संदेश याद रखता है। जैसे कोई ध्यान से सुनने वाली टीचर, सबके सवाल अपनी डायरी में लिख लेती है। तीसरी मंज़िल पर कोई इंतज़ार कर रहा है। सातवीं पर कोई और। और अंदर किसी ने दसवीं दबाई है। अब कंट्रोलर एक समझदार योजना बनाता है। अगर लिफ्ट ऊपर जा रही है, तो पहले ऊपर जाने वालों को लेती है। फिर नीचे वालों के लिए लौटती है। इससे किसी को बेवजह चक्कर नहीं काटने पड़ते। वाह-तथ्य! बड़ी इमारतों में कई लिफ्टों के दिमाग़ आपस में बात करते हैं। और तय करते हैं कि कौन-सी लिफ्ट आप तक सबसे जल्दी पहुँचेगी! पर दिमाग़ को कैसे पता कि लिफ्ट अभी कहाँ है? यहीं आते हैं हमारे सुपरस्टार... सेंसर!
7:21मंज़िल गिनने वाले सेंसर
सेंसर लिफ्ट की आँखों और कानों जैसे होते हैं। शाफ़्ट की दीवार पर, हर मंज़िल के पास, छोटे-छोटे निशान लगे होते हैं। कई लिफ्टों में ये छोटे चुंबक होते हैं। कई में धातु की पतली पट्टियाँ। डिब्बे पर एक सेंसर लगा होता है। जैसे ही डिब्बा किसी निशान से गुज़रता है, सेंसर तुरंत दिमाग़ को बताता है। 'अभी चौथी मंज़िल आई!' फिर, 'पाँचवीं!' फिर, 'छठी!' बिल्कुल वैसे, जैसे आप सीढ़ियाँ चढ़ते हुए गिनती करते हैं। और भी कमाल की बात सुनिए। मोटर के पहिये के पास एक और सेंसर होता है। यह गिनता है कि पहिया कितनी बार, और कितना घूमा। इससे दिमाग़ को डिब्बे की जगह बहुत बारीकी से पता रहती है। वाह-तथ्य! आधुनिक लिफ्ट अपनी जगह कुछ ही मिलीमीटर तक जान सकती है। यानी चावल के एक दाने जितनी बारीकी से! पर जानना एक बात है... और ठीक जगह रुकना दूसरी। अब देखिए रुकने का कमाल!
8:36ठीक बराबर रुकना
सोचिए, आप साइकिल चला रहे हैं। और आपको ठीक एक लाइन पर रुकना है। आप आख़िरी पल में अचानक ब्रेक नहीं लगाते, है ना? आप पहले से धीरे-धीरे रफ़्तार कम करते हैं। लिफ्ट भी बिल्कुल यही करती है! जब आपकी मंज़िल पास आती है, सेंसर दिमाग़ को इशारा देते हैं। दिमाग़ मोटर से कहता है, 'धीरे चलो।' डिब्बा धीमा होता जाता है। और फिर ठीक फ़र्श के बराबर, नरमी से रुक जाता है। इसे लेवलिंग कहते हैं। अगर बहुत सारे लोग अंदर आ जाएँ, और रस्सियाँ ज़रा-सी खिंच जाएँ, तो लिफ्ट यह भी महसूस कर लेती है। और ख़ुद को फिर से बराबर कर लेती है। फिर दरवाज़े खुलते हैं। दरवाज़ों के किनारे पर अदृश्य रोशनी की किरणें होती हैं। ये देखती हैं कि बीच में कोई है या नहीं। वाह-तथ्य! अगर कोई दरवाज़ों के बीच हो, तो किरण रुक जाती है। और दरवाज़े अपने आप फिर से खुल जाते हैं! पर लिफ्ट में एक और ख़ास सुरक्षा टीम छिपी है। चलिए, मिलते हैं उन रखवालों से।
9:55सुरक्षा के रखवाले
लिफ्ट बनाने वाले इंजीनियर सुरक्षा को सबसे ज़्यादा अहमियत देते हैं। शाफ़्ट के ऊपर एक छोटा पहिया होता है। इसे गवर्नर कहते हैं। यह हर समय डिब्बे की रफ़्तार पर नज़र रखता है। जैसे कोई ध्यान रखने वाला कोच। अगर डिब्बा कभी तय रफ़्तार से तेज़ चलने लगे, तो गवर्नर तुरंत सुरक्षा ब्रेक को इशारा देता है। ये ब्रेक गाइड रेल को कसकर पकड़ लेते हैं। और डिब्बा आराम से थम जाता है। शाफ़्ट के सबसे नीचे मज़बूत गद्दी जैसे बफ़र भी होते हैं। ठीक वैसे, जैसे खेल के मैदान में नरम मैट। और हाँ... कई रस्सियाँ, पक्के ब्रेक, और नियमित जाँच। ये सब मिलकर लिफ्ट को सबसे सुरक्षित सवारियों में से एक बनाते हैं। वाह-तथ्य! लिफ्ट के सुरक्षा ब्रेक का आविष्कार डेढ़ सौ साल से भी ज़्यादा पहले हुआ था। और इसी की वजह से ऊँची-ऊँची इमारतें बनना मुमकिन हुआ! तो चलिए, अब पूरे सफ़र को एक बार फिर याद करते हैं।
11:09याद करें और चुनौती
क्या शानदार सफ़र था! हमने देखा, लिफ्ट गाइड रेल पर सीधी चलती है। वह गूँथी हुई स्टील की रस्सियों से लटकती है। और उसका दोस्त काउंटरवेट, झूले की तरह उसका वज़न संतुलित करता है। हमने ताक़तवर मोटर और नालीदार पहिया देखा। समझदार कंप्यूटर-दिमाग़ से मिले। और उन सेंसरों को देखा, जो हर मंज़िल गिनते हैं। ताकि लिफ्ट धीरे होकर, ठीक आपके फ़र्श के बराबर रुके। अब आपके लिए एक मज़ेदार चुनौती! घर पर किसी बड़े की मदद लीजिए। एक स्केल को गोल पेंसिल पर रखिए। बन गया छोटा-सा सी-सॉ! एक तरफ़ दो सिक्के रखिए। फिर दूसरी तरफ़ सिक्के रखकर उसे बराबर कीजिए। लो... आपने अपना ख़ुद का काउंटरवेट बना लिया! और आज रात खाने पर, परिवार को एक बात बताइए। लिफ्ट की अक्सर एक अकेली रस्सी भी पूरा डिब्बा संभाल सकती है! अगली बार जब आप लिफ्ट का बटन दबाएँ, तो याद रखिए... अंदर एक पूरी टीम आपके लिए काम कर रही है। फिर मिलेंगे, नए सवालों और नई खोजों के साथ!
अन्य भाषाओं में
- English: How Does a Lift Know Which Floor to Stop At? Ride Inside the Shaft!
- संस्कृतम्: उद्वाहकः कथं जानाति कुत्र स्थातव्यम् इति?
और वीडियो
शृंखला: science (हिन्दी)