Samvada

पीलू छतरी और पोखरों का जादुई सफ़र

2026-10-21 · YouTube पर देखें

सारांश

एक शर्मीली पीली छतरी पीलू बारिश के पोखर इकट्ठा करना चाहती है, ताकि वह भी ख़ास बन सके। पर जब उसके पोखर ग़ायब होने लगते हैं, तो एक नन्ही बूँद उसे पोखर से नदी और नदी से बादल तक के सफ़र पर ले जाती है।

पूरा पाठ

0:00शर्मीली पीली छतरी

एक छोटा-सा पहाड़ी कस्बा था। वहाँ एक घर था, नीले दरवाज़े वाला। उस घर के कोने में रहती थी... एक पीली छतरी। उसका नाम था पीलू। पीलू बहुत शर्मीली थी। कोई उसे खोलता, तो वह धीरे से 'चट' करती। और अपनी तीलियाँ सिकोड़ लेती। मानो कह रही हो, 'मुझे मत देखो!' छतरी-स्टैंड में उसके साथ दो और छतरियाँ रहती थीं। एक बड़ी काली छतरी। और एक लाल फूलों वाली छतरी। काली छतरी हमेशा दादाजी के साथ बाज़ार जाती। लाल छतरी मम्मी के साथ दफ़्तर जाती। और पीलू? पीलू तो मीरा की छतरी थी। मीरा अभी सिर्फ़ सात साल की थी। पीलू को लगता था, वह किसी काम की नहीं। 'मैं तो बस एक छोटी-सी पीली छतरी हूँ,' वह सोचती। 'न बड़ी, न मज़बूत, न ख़ास।'

1:05पहली बारिश

फिर एक सुबह... आसमान में बादल गरजे। और बारिश शुरू हो गई! मीरा ने पीलू को उठाया। और स्कूल की ओर चल पड़ी। रास्ते भर आवाज़ें आती रहीं... टप-टप, छप-छप। पीलू ने नीचे देखा। उसकी आँखें चमक उठीं! सड़क किनारे छोटे-छोटे गड्ढे थे, पानी से भरे। हर गड्ढे में आसमान की तस्वीर दिख रही थी। बच्चे उनमें कूद रहे थे, हँस रहे थे। 'वाह!' पीलू ने सोचा। 'ये पोखर कितने सुंदर हैं! इनमें बादल हैं, पेड़ हैं। और मेरा पीला रंग भी चमकता है।' उसी पल पीलू ने एक बड़ा फ़ैसला किया। 'मैं इन पोखरों को इकट्ठा करूँगी। मेरे पास ढेर सारे पोखर होंगे... तो शायद मैं भी ख़ास बन जाऊँगी।'

2:04बूँदी से मुलाक़ात

उस दिन मीरा कक्षा में थी। और पीलू स्कूल के बाहर थी। पीलू ने पूरी कोशिश की। उसने अपनी तीलियाँ उल्टी कर लीं। ताकि बारिश का पानी उसके अंदर जमा हो जाए। पानी भरने लगा। पहले एक कटोरी जितना... फिर दो कटोरी जितना। 'देखो, मेरा पहला पोखर!' पीलू ख़ुशी से बोली। तभी उसके किनारे पर बैठी एक नन्ही-सी बूँद खिलखिला कर हँसी। वह चमक रही थी। 'नमस्ते! मैं बूँदी हूँ,' उसने कहा। 'पर पीलू, तुम मुझे यहाँ ज़्यादा देर नहीं रख पाओगी।' 'क्यों नहीं?' पीलू ने पूछा। 'क्योंकि पानी को घूमना पसंद है,' बूँदी बोली। 'हम कभी एक जगह नहीं ठहरते। चलो, मैं तुम्हें दिखाती हूँ, हम कहाँ जाते हैं।'

3:04ग़ायब होते पोखर

अगली सुबह सूरज निकला। पीलू आँगन में खुली रखी थी, सूखने के लिए। उसने आसपास देखा... और उसका दिल धक-से रह गया! कल के बड़े-बड़े पोखर अब छोटे हो गए थे। कुछ तो पूरी तरह ग़ायब थे! 'मेरे पोखर! वे कहाँ चले गए?' पीलू घबरा कर बोली। बूँदी अब भी उसकी एक तीली पर लटकी थी। वह मुस्कुराई। 'डरो मत। कुछ पानी ज़मीन के अंदर चला गया। ताकि पेड़-पौधों की जड़ें उसे पी सकें। और कुछ पानी ढलान से बह गया, उस छोटे नाले में। देखो!' पीलू ने देखा। आँगन के किनारे से एक पतली-सी धारा बह रही थी। चमकती हुई, गुनगुनाती हुई। जैसे कोई गाना गा रही हो।

4:03नदी तक सफ़र

तभी हवा का एक झोंका आया। हल्का-सा, शरारती-सा। 'चलो, सैर करते हैं!' हवा ने फुसफुसाया। और पीलू धीरे से ऊपर उठ गई... जैसे कोई पीली पतंग! वे धारा के साथ-साथ उड़ते चले। आगे जाकर धारा एक बड़ी नदी से मिली। नदी चौड़ी थी, शांत थी। उसमें सैकड़ों धाराओं का पानी मिलकर बह रहा था। 'यह देखो,' बूँदी बोली। 'हर पोखर, हर नाला, हर छोटी धारा... आख़िर में यहीं आती है। नदी सबको साथ लेकर चलती है। खेतों को पानी देती है। मछलियों को घर देती है। और गाँवों की प्यास बुझाती है।' पीलू चुपचाप देखती रही। 'तो मेरे पोखर खोए नहीं,' उसने धीरे से कहा। 'वे तो काम पर गए हैं!'

5:03भाप से बादल

नदी के ऊपर सूरज की गर्म किरणें चमक रही थीं। पीलू ने कुछ देखा। पानी की सतह से हल्की-सी भाप उठ रही थी। पतली-सी, इतनी हल्की कि लगभग दिखती भी नहीं। 'यह क्या है?' पीलू ने पूछा। 'यही तो सबसे जादुई हिस्सा है,' बूँदी ने कहा। 'जब सूरज पानी को गर्म करता है, तो पानी बहुत हल्का हो जाता है। इतना हल्का, कि हवा में उड़ जाता है। ऊपर ठंडी हवा होती है। वहाँ वह फिर से नन्ही-नन्ही बूँदें बन जाता है। और बहुत सारी बूँदें मिलकर बनाती हैं...' 'बादल!' पीलू चिल्लाई। 'बिल्कुल सही!' बूँदी हँसी। फिर उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई। 'पीलू... अब मेरी भी ऊपर जाने की बारी है।'

6:01बूँदी की विदाई

पीलू का कपड़ा थोड़ा सिकुड़ गया। 'पर तुम तो मेरी दोस्त हो। मैं तुम्हें इकट्ठा करना चाहती थी। अपने पास रखना चाहती थी।' बूँदी ने प्यार से कहा, 'पीलू, पानी को कोई अपने पास नहीं रख सकता। हम पोखर बनते हैं, फिर नदी, फिर बादल। और फिर बारिश बनकर लौट आते हैं। यही हमारा काम है। यही हमारा सफ़र है। हर किसी का कोई न कोई काम होता है।' 'पर मेरा काम क्या है?' पीलू ने उदास होकर पूछा। 'मैं तो कुछ नहीं करती।' बूँदी ने आँख मारी। 'यह तो तुम्हें ख़ुद पता लगाना होगा। अगली बारिश में मिलते हैं!' और वह चमकती हुई, धीरे-धीरे हवा में ऊपर उठ गई... एक नन्हे सफ़ेद बादल की ओर।

6:59बादल लौट आए

हवा पीलू को वापस ले चली। वह धीरे से नीचे उतरी। स्कूल के पास एक छोटा बग़ीचा था, उसकी एक बेंच पर। तभी स्कूल की घंटी बजी। बच्चे बाहर निकलने लगे। पीलू ने ऊपर देखा। आसमान में बादल घने होते जा रहे थे। भारी-भारी, भूरे-से। 'ओह, ये तो वही बूँदें हैं!' पीलू ने सोचा। 'वे लौट रही हैं!' फिर उसकी नज़र मीरा पर पड़ी। मीरा गेट के पास खड़ी थी। इधर-उधर देख रही थी। उसके हाथ में कोई छतरी नहीं थी। 'मेरी पीलू कहाँ गई?' वह बुदबुदाई। पास ही उसका छोटा भाई चिंटू खड़ा था। और बेंच के नीचे एक भीगी गौरैया दुबकी बैठी थी। टप। टप। टप-टप-टप... बारिश फिर से शुरू हो गई।

8:03पीलू की हिम्मत

पीलू का पहला मन हुआ... सिकुड़ जाए, छिप जाए। जैसे हमेशा करती थी। पर फिर उसने मीरा की भीगती चोटियाँ देखीं। चिंटू के काँपते हाथ देखे। और गौरैया के गीले पंख। 'नहीं,' पीलू ने ख़ुद से कहा। 'आज मैं नहीं छिपूँगी।' उसने अपनी पूरी ताक़त लगाई। और... 'चट!' सबसे ज़ोरदार आवाज़ के साथ, वह पूरी तरह खुल गई! धूसर बारिश के बीच वह ऐसे चमकी... जैसे बादलों से सूरज का एक टुकड़ा निकल आया हो। 'पीलू!' मीरा ख़ुशी से चिल्लाई। वह दौड़कर उसके पास आई। उसने पीलू को ऊपर उठाया। चिंटू को पास खींचा। और फुदकती गौरैया भी आ गई। उनके पैरों के पास आकर बैठ गई।

9:01पीलू का ख़ास गुण

बारिश छतरी पर टप-टप गाती रही। पर नीचे सब सूखे थे, सुरक्षित थे। पीलू को अपने ऊपर हर बूँद महसूस हो रही थी। और हर बूँद जैसे कह रही थी, 'शाबाश, पीलू!' तब पीलू को समझ आया। बारिश का काम है घूमना। सफ़र करना, सबको पानी देना। और पीलू का काम? बारिश में किसी को अपनी छाँव देना। यही उसका ख़ास गुण था। वह छोटी थी... पर मीरा, चिंटू और उस नन्ही गौरैया के लिए, वह पूरा आसमान थी। घर लौटते हुए मीरा हर पोखर के पास से गुज़री। पीलू ने उनमें अपना चमकता पीला रंग देखा। और वह मुस्कुराई। अब उसे पोखर इकट्ठा करने की ज़रूरत नहीं थी। वह जानती थी, वे नदी तक जाएँगे। बादल बनेंगे। और फिर लौट आएँगे। और जब वे लौटेंगे... पीलू तैयार होगी। किसी को अपने नीचे जगह देने के लिए।

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