पिम: वो पतंग जिसे हवा से डर लगता था
सारांश
पिम नाम की एक काग़ज़ी पतंग हर हवादार दिन अलमारी में छिप जाती है, क्योंकि उसे लगता है कि हवा उसे फाड़ देगी। फिर धैर्यवान मीरा उसे दिखाती है कि हवा असल में पतंग को कैसे उठाती है।
पूरा पाठ
0:00पहाड़ी का छोटा घर
एक छोटे-से पहाड़ी कस्बे में, जहाँ घरों की छतें लाल थीं और सुबह की धूप शहद जैसी सुनहरी होती थी, वहाँ मीरा नाम की एक नौ साल की लड़की रहती थी। मीरा को सवाल पूछना बहुत पसंद था — बादल क्यों तैरते हैं, चिड़ियाँ क्यों नहीं गिरतीं, और चाँद रात भर जागता क्यों है। एक बरसाती शाम, मीरा के दादाजी ने बाँस की दो पतली तीलियों, नीले और पीले काग़ज़, थोड़े-से गोंद और एक लंबी रंगीन पूँछ से उसके लिए एक पतंग बनाई। पतंग के बीचोंबीच उन्होंने दो गोल आँखें और एक छोटी-सी मुस्कान भी बना दी। मीरा ने ताली बजाकर कहा, 'तुम्हारा नाम होगा पिम!' और उसी पल पिम की काग़ज़ी आँखें झपकीं। पिम जाग गया था। उसे आसमान बहुत प्यारा लगता था। पर एक चीज़ से उसे बहुत, बहुत डर लगता था... हवा से।
1:00अलमारी में छिपा पिम
जिस दिन भी खिड़की के पर्दे हिलने लगते, पेड़ों की पत्तियाँ सरसराने लगतीं, या आँगन में सूखे पत्ते गोल-गोल नाचने लगते, पिम चुपके से सरककर कपड़ों की अलमारी में छिप जाता। वहाँ, ऊनी स्वेटरों और पुराने मफ़लरों के बीच, वह अपनी पूँछ को कसकर लपेट लेता और आँखें मूँद लेता। 'हवा बहुत ज़ोर से धक्का देती है,' वह मन ही मन सोचता। 'अगर उसने मुझे फाड़ दिया तो? अगर उसने मुझे उड़ाकर कहीं दूर फेंक दिया, जहाँ से मैं कभी लौट ही न पाऊँ तो?' बाहर दूसरे बच्चों की पतंगें आसमान में लहरातीं — लाल, हरी, बैंगनी। पिम अलमारी की दरार से उन्हें देखता और उसका काग़ज़ी दिल थोड़ा-सा उदास हो जाता। वह भी उड़ना चाहता था। बस... बिना हवा के।
1:55मीरा की खोज
एक हवादार सुबह, मीरा अपना स्वेटर निकालने अलमारी के पास गई। दरवाज़ा खोलते ही उसे स्वेटरों के पीछे से एक नीला कोना झाँकता दिखा, जो हल्के-हल्के काँप रहा था। 'पिम? तुम यहाँ क्या कर रहे हो?' मीरा ने धीरे से पूछा। पिम ने एक आँख खोली। 'बाहर... हवा है,' उसने फुसफुसाकर कहा। 'मुझे हवा से डर लगता है, मीरा। वह मुझे फाड़ देगी। वह मुझे गिरा देगी।' मीरा हँसी नहीं। उसने पिम को डाँटा भी नहीं। वह बस अलमारी के पास ज़मीन पर बैठ गई, घुटनों पर ठोड़ी टिकाई और बोली, 'ठीक है। डर लगना कोई बुरी बात नहीं है। पर क्या मैं तुम्हें हवा के बारे में एक राज़ बताऊँ? एक ऐसा राज़, जो शायद तुम्हें पता ही नहीं?' पिम ने दूसरी आँख भी खोल दी।
2:50काग़ज़ की पट्टी का जादू
मीरा ने अपनी कॉपी से काग़ज़ की एक लंबी, पतली पट्टी फाड़ी। उसने पट्टी का एक सिरा अपने निचले होंठ के ठीक नीचे पकड़ा। पट्टी नीचे की ओर लटक गई, बिल्कुल ढीली, बिल्कुल थकी हुई। 'अब देखो,' मीरा ने कहा, और पट्टी के ऊपर से ज़ोर से फूँक मारी। अरे! पट्टी झट से ऊपर उठ गई और हवा में सीधी तैरने लगी। पिम की आँखें गोल हो गईं। 'यह... यह गिरी क्यों नहीं?' 'क्योंकि हवा सिर्फ़ धक्का नहीं देती, पिम,' मीरा ने समझाया। 'जब हवा तेज़ी से किसी चीज़ के पास से बहती है, तो वह उसे उठा भी सकती है। हवा चीज़ों को गिराने वाला कोई राक्षस नहीं है। सही ढंग से मिले, तो वह उठाने वाला एक हाथ है।'
3:43डोर, ढाँचा और पूँछ
फिर मीरा ने पिम को धीरे से उठाया और उसे आईने के सामने रखा। 'तुम्हें पता है, तुम कितने खास बने हो?' उसने पिम की बाँस की तीलियों को छुआ। 'यह तुम्हारा ढाँचा है। यह तुम्हें मज़बूत रखता है, ताकि हवा तुम्हें मोड़ न सके।' फिर उसने पिम के सामने वाले हिस्से से बँधी डोर को पकड़ा। 'और यह डोर तुम्हें हल्का-सा तिरछा रखती है — जैसे तुम्हारा चेहरा थोड़ा ऊपर की ओर झुका हो। जब हवा तुम्हारे नीचे से टकराती है, तो वह तुम्हें ऊपर की तरफ़ धकेलती है। डोर तुम्हें पकड़े रहती है, और हवा तुम्हें उठाती है। दोनों मिलकर तुम्हें उड़ाते हैं।' 'और मेरी पूँछ?' पिम ने पूछा। मीरा मुस्कुराई। 'तुम्हारी पूँछ तुम्हें सीधा रखती है, ताकि तुम लट्टू की तरह गोल-गोल न घूमो।' पिम ने पहली बार अपने आप को ध्यान से देखा।
4:42पहली कोशिश
अगले दिन हल्की-सी हवा चल रही थी — इतनी हल्की कि बस पेड़ों की ऊपरी पत्तियाँ हिल रही थीं। मीरा पिम को घर के पीछे वाले खुले घास के मैदान में ले गई, जहाँ न कोई पेड़ था, न कोई बिजली का तार। 'मैं डोर पकड़ूँगी, और तुम्हें बस अपना चेहरा हवा की तरफ़ रखना है,' मीरा ने कहा। उसने पिम को ऊपर उठाया और छोड़ दिया। पिम थोड़ा-सा उठा... फिर हवा का एक झोंका आया, और पिम घबरा गया। उसने अपना चेहरा हवा से फेर लिया। बस, फिर क्या था! पिम लड़खड़ाया, गोल-गोल घूमा, और धप्प से नरम घास पर आ गिरा। उसकी पूँछ उलझ गई और एक कोने पर घास का एक तिनका चिपक गया। 'देखा?' पिम ने रुआँसा होकर कहा। 'मैंने कहा था न। हवा मेरी दोस्त नहीं है।'
5:38मीरा का अपना डर
मीरा ने पिम को उठाया, उसकी पूँछ सुलझाई और तिनका हटाया। फिर वह घास पर बैठ गई। 'पिछले साल स्कूल में मुझे सबके सामने एक कविता सुनानी थी,' उसने कहा। 'मैं इतना डर गई थी कि पहली बार मंच पर जाते ही सब भूल गई। सब लोग मुझे देख रहे थे।' 'फिर क्या हुआ?' पिम ने पूछा। 'फिर मैंने घर पर रोज़ अभ्यास किया — पहले आईने के सामने, फिर दादाजी के सामने, फिर पूरे परिवार के सामने। और अगली बार, जब मैंने सबकी तरफ़ देखा, तो मुझे समझ आया कि वे मेरे ख़िलाफ़ नहीं थे। वे मेरा साथ दे रहे थे।' मीरा ने पिम की आँखों में देखा। 'तुम आज इसलिए नहीं गिरे क्योंकि हवा बुरी है, पिम। तुम इसलिए गिरे क्योंकि तुमने हवा से मुँह फेर लिया।' पिम बहुत देर तक चुप रहा। फिर बोला, 'एक बार और?'
6:35बड़ी हवा का दिन
कुछ दिनों तक वे रोज़ अभ्यास करते रहे। हर दिन पिम थोड़ा-सा ऊँचा उड़ता, और हर दिन थोड़ा कम काँपता। फिर एक शनिवार, कस्बे में पतंग मेला लगा। उस दिन की हवा पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ थी। सुबह पिम को वही पुराना डर फिर से महसूस हुआ। उसके मन में आया कि बस चुपचाप अलमारी में सरक जाए, स्वेटरों के पीछे, जहाँ सब शांत है। वह अलमारी के दरवाज़े तक पहुँच भी गया। पर फिर उसे काग़ज़ की वह पतली पट्टी याद आई, जो फूँक लगते ही ऊपर उठ गई थी। उसे मीरा की कविता याद आई। पिम ने गहरी साँस ली — जितनी गहरी एक काग़ज़ की पतंग ले सकती है — और बोला, 'मीरा, चलो। मैं तैयार हूँ।'
7:27हवा से दोस्ती
पहाड़ी के ऊपर वाला खुला मैदान रंग-बिरंगी पतंगों से भरा था। मीरा ने डोर कसकर पकड़ी, पिम को ऊँचा उठाया और कहा, 'चेहरा हवा की तरफ़, पिम!' फिर उसने उसे छोड़ दिया। एक बड़ा झोंका आया। पिम का दिल धक-धक करने लगा, पर इस बार उसने मुँह नहीं फेरा। उसने अपना चेहरा हल्का-सा ऊपर झुकाया, बिल्कुल वैसे जैसे मीरा ने सिखाया था। हवा उसके नीचे से टकराई, डोर ने उसे थामे रखा, और पूँछ ने उसे सीधा रखा। और फिर — पिम उठा। ऊपर, और ऊपर, और ऊपर! लाल छतें छोटी होती गईं। चिड़ियाँ उसके पास से गुज़रीं। नीचे मीरा एक छोटी-सी बिंदी जैसी दिख रही थी, ख़ुशी से उछलती हुई। और पिम को एक अजीब-सी, मीठी बात महसूस हुई — हवा उसे धक्का नहीं दे रही थी। हवा उसे गोद में उठाए हुए थी।
8:26नया पिम
उस शाम, जब सूरज नारंगी हो चला, मीरा ने धीरे-धीरे डोर लपेटी और पिम को सावधानी से नीचे उतारा। पिम के कोनों पर अब भी हवा की ठंडक थी, और उसकी आँखें चमक रही थीं। उस दिन के बाद, पिम कभी अलमारी में नहीं छिपा। अब जब भी खिड़की के पर्दे हिलते और पेड़ों की पत्तियाँ सरसरातीं, पिम सबसे पहले दरवाज़े के पास पहुँच जाता और अपनी रंगीन पूँछ हिलाकर कहता, 'मीरा! मीरा! मेरी दोस्त आई है!' दादाजी मुस्कुराते, मीरा हँसते हुए डोर उठाती, और दोनों उस पहाड़ी की ओर चल पड़ते। क्योंकि पिम ने अब सीख लिया था कि जिस चीज़ से हम सबसे ज़्यादा डरते हैं, कभी-कभी वही हमें सबसे ऊँचा उठाने के लिए आई होती है।
अन्य भाषाओं में
- English: The Kite That Was Afraid of the Wind | A Cozy Story About Courage
- संस्कृतम्: वायोः भीतः पतङ्गः – पिमस्य प्रथमम् उड्डयनम्
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