बेपीकोलंबो: 8 साल बाद सबसे छोटे ग्रह बुध तक का मुश्किल सफ़र!
सारांश
सूरज के सबसे पास वाले ग्रह बुध तक पहुँचना प्लूटो जाने से भी ज़्यादा मुश्किल क्यों है? आठ साल, नौ फ़्लाईबाई और नीली चमक वाले इंजन के साथ, दो रोबोट खोजी 21 नवंबर 2026 को बुध पहुँचने वाले हैं।
पूरा पाठ
0:00आठ साल का सफ़र
क्या तुम जानते हो कि सूरज के सबसे पास वाले ग्रह तक पहुँचने में, दूर बर्फ़ीले प्लूटो तक जाने से भी ज़्यादा ताकत लगती है? हाँ, बिल्कुल सच! एक अंतरिक्ष यान पिछले आठ सालों से उड़ रहा है, बस इस छोटे से ग्रह तक पहुँचने के लिए। उस ग्रह का नाम है बुध, और उस यान का नाम है बेपीकोलंबो। इक्कीस नवंबर, दो हज़ार छब्बीस को बेपीकोलंबो आख़िरकार बुध तक पहुँचने वाला है, और उसके चारों ओर चक्कर लगाना शुरू करेगा। लेकिन एक मज़ेदार राज़ सुनो। बेपीकोलंबो असल में एक अकेला यान नहीं है। यह कई हिस्सों का एक ऊँचा ढेर है, जैसे एक के ऊपर एक रखे डिब्बे, और इसके अंदर दो रोबोट खोजी साथ-साथ सवारी कर रहे हैं! ये दोनों दोस्त कौन हैं? और बुध तक पहुँचना इतना मुश्किल क्यों है? पहले उस अजीब ग्रह से मिलते हैं, जहाँ ये जा रहे हैं!
1:04बुध से मिलो
यह है बुध, हमारे सौर मंडल का सबसे छोटा ग्रह। यह हमारे चाँद से बस थोड़ा सा ही बड़ा है, और इसकी सतह भी चाँद की तरह गड्ढों से भरी है। बुध सूरज का सबसे करीबी पड़ोसी है, इसलिए यह सूरज के चारों ओर बहुत तेज़ी से दौड़ता है। बुध का एक साल सिर्फ़ अठासी दिन का होता है! सोचो, अगर तुम बुध पर रहते, तो हर तीन महीने में तुम्हारा जन्मदिन आता। ढेर सारा केक! लेकिन बुध का मौसम बड़ा अजीब है। दिन में वहाँ की ज़मीन चार सौ डिग्री सेल्सियस से भी ज़्यादा गरम हो जाती है, किसी भी रसोई के ओवन से कहीं ज़्यादा। और रात में वही ज़मीन माइनस एक सौ अस्सी डिग्री तक ठंडी हो जाती है, किसी भी फ़्रीज़र से कहीं ज़्यादा ठंडी! ऐसा इसलिए, क्योंकि बुध के पास गर्मी को कंबल की तरह पकड़ कर रखने वाली हवा लगभग है ही नहीं। अब तुम सोच रहे होगे, सूरज के इतने पास वाला ग्रह तो सीधा रास्ता होगा, है ना? लेकिन रुको, असली पहेली तो अब शुरू होती है!
2:12सबसे मुश्किल रास्ता
यह रहा बड़ा राज़। सूरज का गुरुत्वाकर्षण हर चीज़ को अपनी तरफ़ खींचता है। तो जब कोई यान सूरज की तरफ़ जाता है, तो वह अपने आप तेज़, और तेज़, और तेज़ होता जाता है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे बर्फ़ीली ढलान पर फिसलती हुई स्लेज! अब सोचो, तुम्हें ढलान के बीच में एक छोटे से झंडे के पास ठीक-ठीक रुकना है। मुश्किल है ना? और अंतरिक्ष में तो ब्रेक भी नहीं होते, क्योंकि वहाँ हवा ही नहीं है जो तुम्हें धीमा कर सके। अगर यान ज़्यादा तेज़ रहा, तो वह बुध के पास से सीधा सर्र से निकल जाएगा, और बुध उसे पकड़ ही नहीं पाएगा। इसीलिए बुध तक पहुँचने के लिए यान को रफ़्तार बढ़ानी नहीं, बल्कि घटानी पड़ती है, और वह भी बहुत सारी! यही वजह है कि प्लूटो तक जाने से भी ज़्यादा मेहनत बुध के लिए लगती है। तो वैज्ञानिकों ने इस पहेली को कैसे सुलझाया? उन्होंने एक बहुत चतुर टीम बनाई। चलो, उस टीम से मिलते हैं!
2:57दो रोबोट दोस्त
बेपीकोलंबो को यूरोप और जापान की अंतरिक्ष एजेंसियों ने मिलकर बनाया है। इस ढेर में सबसे ऊपर है जापान का रोबोट, जिसका नाम है मियो। मियो का काम है बुध के चारों ओर फैली एक अदृश्य चुंबकीय ढाल को समझना, जो सूरज से आने वाली तेज़ हवा को मोड़ देती है। उसके नीचे है यूरोप का रोबोट, मरकरी प्लैनेटरी ऑर्बिटर। यह बुध की सतह, उसकी चट्टानों और उसके अंदर छिपे राज़ों की तस्वीरें और नक्शे बनाएगा। और सबसे नीचे है एक ताकतवर हिस्सा, जिसे ट्रांसफ़र मॉड्यूल कहते हैं। यह एक बस ड्राइवर की तरह है, जो दोनों दोस्तों को उनकी मंज़िल तक पहुँचाता है। और यह नाम, बेपीकोलंबो, कहाँ से आया? यह इटली के एक वैज्ञानिक के नाम पर है, जिन्हें प्यार से बेपी बुलाते थे। उन्होंने ही सबसे पहले हिसाब लगाया था कि कोई यान ग्रहों के पास से गुज़र कर अपना रास्ता कैसे बदल सकता है। लेकिन पहले तो इस ढेर को धरती से उड़ान भरनी थी। और वह दिन कितना शानदार था!
4:08उड़ान का दिन
अक्टूबर, दो हज़ार अठारह की एक रात। दक्षिण अमेरिका में, घने हरे जंगलों और समुद्र के किनारे बने एक अंतरिक्ष केंद्र पर, एक विशाल रॉकेट तैयार खड़ा था। उल्टी गिनती शुरू हुई। तीन, दो, एक! आग और धुएँ के बादलों के बीच रॉकेट गरजता हुआ आसमान की ओर उड़ चला। उसके अंदर बैठा बेपीकोलंबो का पूरा ढेर लगभग चार हज़ार किलो का था। यानी एक हाथी जितना भारी! दुनिया भर में वैज्ञानिक अपनी स्क्रीन के सामने बैठे थे, और जैसे ही यान सही-सलामत अंतरिक्ष में पहुँचा, सबने ख़ुशी से तालियाँ बजाईं। कई लोग तो इस मिशन पर सालों से काम कर रहे थे, और अब उनका सपना सच में उड़ रहा था। लेकिन यहाँ एक मज़ेदार बात है। रॉकेट ने यान को धरती से दूर तो पहुँचा दिया, पर बुध तक का बाकी लंबा सफ़र यान को ख़ुद तय करना था। और उसके पास था एक बहुत ख़ास, नीली रोशनी वाला इंजन!
5:12नीली चमक वाला इंजन
इस इंजन को आयन इंजन कहते हैं। यह एक ख़ास गैस के छोटे-छोटे कणों को बिजली की मदद से बहुत तेज़ी से पीछे की ओर फेंकता है, और इससे यान आगे की ओर खिसकता है। और जब यह चलता है, तो पीछे एक सुंदर नीली चमक दिखाई देती है! इस इंजन के लिए बिजली आती है यान के लंबे-लंबे सोलर पैनलों से, जो धूप को बिजली में बदलते हैं। अब एक मज़ेदार बात। इस इंजन का धक्का इतना हल्का होता है, जितना तुम्हारी हथेली पर रखे कुछ काग़ज़ के पन्नों का वज़न! इतना कम? हाँ! लेकिन इसकी ताकत इसका धीरज है। यह इंजन हफ़्तों और महीनों तक लगातार चलता रह सकता है, बिना थके। बिल्कुल उस कछुए की तरह, जो धीरे-धीरे पर लगातार चलकर रेस जीत जाता है। फिर भी, बुध तक पहुँचने के लिए इतना काफ़ी नहीं था। यान को कुछ बड़े दोस्तों की मदद चाहिए थी। और वे दोस्त थे, ख़ुद ग्रह!
6:14नौ फ़्लाईबाई
वैज्ञानिकों ने एक चतुर तरकीब अपनाई, जिसे फ़्लाईबाई कहते हैं। जब यान किसी ग्रह के पास से गुज़रता है, तो उस ग्रह का गुरुत्वाकर्षण यान को हल्का सा खींचता है, और उसकी रफ़्तार और दिशा बदल देता है। यह ऐसा है, जैसे दौड़ते हुए तुम किसी दोस्त का हाथ पकड़ो और घूम कर नई दिशा में चल पड़ो! बेपीकोलंबो ने यह तरकीब पूरे नौ बार की। पहले, दो हज़ार बीस में, वह एक बार अपनी धरती के पास से गुज़रा। फिर दो बार हमारे पड़ोसी ग्रह शुक्र के पास से। और फिर, छह बार ख़ुद बुध के पास से! हर फ़्लाईबाई एक हल्के ब्रेक की तरह थी, जो यान को थोड़ा-थोड़ा धीमा करती गई। एक फ़्लाईबाई में तो यह बुध की सतह से सिर्फ़ लगभग दो सौ किलोमीटर ऊपर से गुज़रा, और उसने गड्ढों और पहाड़ों की शानदार तस्वीरें भेजीं! लेकिन इस लंबे सफ़र में एक और बड़ी चुनौती थी, एक बहुत ही गरम चुनौती!
7:17धूप से बचाव
बुध के पास सूरज की धूप धरती के मुकाबले लगभग दस गुना ज़्यादा तेज़ होती है! सोचो, जैसे दस सूरज एक साथ चमक रहे हों। ऐसी तेज़ धूप में यान के नाज़ुक उपकरण ख़राब हो सकते थे। इसलिए इंजीनियरों ने यान को चमकीले, ख़ास कंबलों में लपेटा, जो कई परतों से बने हैं और ज़्यादातर गर्मी को वापस लौटा देते हैं। यूरोप वाले रोबोट पर एक बड़ा पैनल है, जो फ़ालतू गर्मी को अंधेरे अंतरिक्ष में बाहर निकाल देता है, जैसे यान की अपनी खिड़की। और जापान का मियो, सफ़र के दौरान एक ख़ास छतरी जैसी ढाल के नीचे छिपा रहता है। सफ़र में एक छोटी अड़चन भी आई। दो हज़ार चौबीस में इंजन उम्मीद से थोड़ा कम धक्का देने लगा। लेकिन टीम घबराई नहीं! उन्होंने मिलकर नया रास्ता बनाया, और पहुँचने की तारीख़ को लगभग एक साल आगे खिसका दिया। यही तो असली वैज्ञानिकों की पहचान है, कभी हार न मानना! तो अब, जब यान आख़िरकार पहुँचेगा, तब क्या होगा?
8:24बुध पर आगमन
इक्कीस नवंबर, दो हज़ार छब्बीस। बेपीकोलंबो बुध के इतने पास पहुँचेगा कि बुध का गुरुत्वाकर्षण उसे आख़िरकार पकड़ लेगा, और यान बुध के चारों ओर घूमने लगेगा। आठ साल की मेहनत का यह सबसे बड़ा पल होगा! पहुँचने से ठीक पहले, बस ड्राइवर यानी ट्रांसफ़र मॉड्यूल अपना काम पूरा करके अलग हो जाएगा। फिर कुछ समय बाद, दोनों रोबोट दोस्त एक-दूसरे को अलविदा कहेंगे। मियो एक बड़े, लंबे घेरे में घूमेगा, और यूरोप का रोबोट बुध के और करीब, छोटे घेरे में। दोनों अलग-अलग जगह से बुध को देखेंगे, और मिलकर उसकी पूरी कहानी बताएँगे। और पता है वे क्या-क्या जाँचेंगे? बुध के ध्रुवों पर कुछ गड्ढे इतने गहरे हैं कि वहाँ कभी धूप पहुँचती ही नहीं। और वैज्ञानिकों का मानना है कि उनके अंदर बर्फ़ छिपी है! सोचो, सूरज के सबसे पास वाले ग्रह पर बर्फ़! तो चलो, अब एक बार याद करते हैं कि आज हमने क्या-क्या सीखा!
9:31याद करें और खेलें
बुध हमारे सौर मंडल का सबसे छोटा और सूरज के सबसे पास वाला ग्रह है, जहाँ एक साल सिर्फ़ अठासी दिन का होता है। वहाँ पहुँचना इतना मुश्किल है, क्योंकि यान को तेज़ नहीं, धीमा होना पड़ता है। बेपीकोलंबो में दो रोबोट दोस्त साथ सवारी कर रहे हैं, जापान का मियो और यूरोप का रोबोट। नीली चमक वाले आयन इंजन और नौ फ़्लाईबाई ने उन्हें आठ साल में मंज़िल तक पहुँचाया। अब तुम्हारे लिए एक मज़ेदार चुनौती! घर पर किसी बड़े की मदद से एक मोटी किताब के सहारे एक ढलान बनाओ। नीचे फ़र्श पर काग़ज़ का एक छोटा टुकड़ा निशान की तरह रख दो। अब एक खिलौना कार ढलान से छोड़ो, और कोशिश करो कि वह ठीक उस निशान पर जाकर रुके। तुम देखोगे कि यह कितना मुश्किल है! अब तुम समझ गए कि बुध तक यान पहुँचाने वाले वैज्ञानिक कितने कमाल के हैं। और आज रात खाने पर अपने परिवार को बताना कि बुध पर हर तीन महीने में जन्मदिन आता है! मिलते हैं अगले सफ़र पर, नन्हे खोजियो!
अन्य भाषाओं में
- English: Why Did It Take 8 Years to Reach Mercury, the Smallest Planet?
- संस्कृतम्: अष्टवर्षाणि अन्तरिक्षे! बेपीकोलम्बो बुधग्रहं प्राप्स्यति
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