50 साल देर से लौटी किताब और उसके हाशिये में छिपी पहेली
सारांश
एक छोटे शहर के पुस्तकालय में सोलह साल की स्वयंसेवक मीरा को एक किताब मिलती है, जो 1976 से वापस नहीं आई थी। उसके हाशिये में लिखे सुराग उसे घंटाघर, एक पुराने लेटरबॉक्स और नदी के घाट तक ले जाते हैं, और आख़िर में एक ऐसे बंद कमरे तक, जिसका राज़ पचास साल से किसी गुमनाम दानदाता के दिल में छिपा था।
पूरा पाठ
0:00लौटी हुई किताब
बुधवार की सुबह थी, और शांतिपुर के पुराने सार्वजनिक पुस्तकालय में सिर्फ़ दो आवाज़ें थीं — छत के पंखे की चरमराहट और रजिस्टर के पन्नों की खड़खड़। मीरा सोलह साल की थी और हर हफ़्ते यहाँ स्वयंसेवक बनकर किताबें जमाती थी। उस दिन उसके हाथ में एक नोटिस भी था, जो दरवाज़े पर लगाना था: 'नगर परिषद के फ़ैसले के अनुसार, यह पुस्तकालय महीने के अंत में बंद कर दिया जाएगा।' मीरा ने नोटिस मोड़कर जेब में रख लिया। अभी नहीं। फिर उसने किताब-वापसी वाला लकड़ी का डिब्बा खोला। अंदर एक ही किताब थी — पीली पड़ चुकी, कपड़े की जिल्द वाली कविताओं की किताब। पिछले पन्ने पर नीली स्याही की मोहर थी। लौटाने की तारीख: चौदह मार्च, उन्नीस सौ छिहत्तर। मीरा ने दोबारा पढ़ा। यह किताब पूरे पचास साल देर से लौटी थी।
0:56हाशिये का सुराग
किताब के साथ कोई पर्ची नहीं थी, कोई नाम नहीं। मीरा ने पन्ने पलटे, और बारहवें पन्ने पर रुक गई। एक कविता के किनारे, हाशिये में, पेंसिल से छोटे-छोटे सुंदर अक्षरों में लिखा था: 'पहला सुराग। जो पूरे शहर को समय बताती है, पर ख़ुद कभी सही नहीं चलती — उसकी नींव पढ़ो, और जो साल मिले, वही पन्ना खोलो।' मीरा के रोंगटे खड़े हो गए। यह किसी पाठक की लापरवाह लिखावट नहीं थी। यह किसी ने बहुत सोचकर, किसी के लिए छोड़ा था। पर किसके लिए? और पचास साल बाद आज ही क्यों? मीरा ने खिड़की से बाहर देखा। चौक के बीच पुराना घंटाघर खड़ा था, जिसकी सुइयाँ सालों से सवा चार पर अटकी थीं। मीरा ने किताब बैग में रखी, दरवाज़े पर 'दस मिनट में लौटूँगी' की तख्ती टाँगी, और बाहर निकल गई।
1:57घंटाघर का साल
घंटाघर के नीचे कबूतरों का झुंड दाना चुग रहा था। मीरा ने चारों ओर चक्कर लगाया, और पीछे की तरफ़ काई से ढका एक पत्थर दिखा। उसने रुमाल से धीरे-धीरे काई पोंछी। अक्षर उभरे: 'नगरवासियों के सहयोग से निर्मित — सन उन्नीस सौ बत्तीस।' बत्तीस। मीरा ने वहीं बेंच पर बैठकर किताब का बत्तीसवाँ पन्ना खोला। वहाँ भी हाशिये में वही लिखावट थी: 'दूसरा सुराग। लाल रंग का वह दोस्त, जो सबकी बातें पेट में रखता है पर कभी किसी से नहीं कहता। उसके माथे पर लिखा अंक ढूँढो।' मीरा मुस्कुराई। सबकी बातें पेट में रखने वाला लाल दोस्त — चिट्ठियों का डिब्बा। पुराने डाकघर का लाल लेटरबॉक्स! वह तेज़ कदमों से बाज़ार की ओर चल पड़ी। पहली बार उसे लगा कि यह पहेली किसी बहुत ज़रूरी जगह ले जा रही है।
2:56गायब लेटरबॉक्स
पर बाज़ार पहुँचकर मीरा के कदम थम गए। जहाँ पुराना डाकघर हुआ करता था, वहाँ अब चमचमाती मोबाइल की दुकान थी। शीशे का दरवाज़ा, रंग-बिरंगे पोस्टर, और लेटरबॉक्स का नामोनिशान तक नहीं। मीरा का दिल बैठ गया। पचास साल पुरानी पहेली, और बीच की कड़ी ही गायब। उसने हिम्मत करके दुकान में पूछा। काउंटर पर बैठे लड़के ने कंधे उचका दिए, 'दीदी, ये तो मेरे पैदा होने से पहले की बात है।' मीरा मुड़ने ही वाली थी कि पीछे से एक बुज़ुर्ग की आवाज़ आई, 'लाल डिब्बा ढूँढ रही हो, बिटिया?' वे दुकान वाले के दादाजी थे। 'जब डाकघर टूटा, तो मुझसे वो डिब्बा फेंका नहीं गया। मेरी पहली नौकरी की चिट्ठी उसी में डाली गई थी।' वे मीरा को पीछे आँगन में ले गए। वहाँ, गमलों के बीच, धूप में चमकता वही लाल लेटरबॉक्स खड़ा था।
3:57घाट की सीढ़ियाँ
लेटरबॉक्स के माथे पर पीतल की एक पट्टी लगी थी: 'डिब्बा संख्या सैंतालीस।' मीरा ने दादाजी का धन्यवाद किया और सैंतालीसवाँ पन्ना खोला। तीसरा सुराग थोड़ा अलग था: 'जहाँ नदी हर दिन विदा होती है पर कोई उसे लौटाने नहीं आता, वहाँ ऊपर से नीचे तक के पत्थर गिनो।' नदी का घाट। मीरा शाम ढलते वहाँ पहुँची। लहरें धीरे-धीरे सीढ़ियों से टकरा रही थीं, और एक माँ अपने बच्चे को दीया बहाना सिखा रही थी। मीरा ने सबसे ऊपर की सीढ़ी से गिनना शुरू किया, एक-एक कदम संभलकर, पानी से दूर रहते हुए, आख़िरी सूखी सीढ़ी तक। गिनती हुई चौंसठ। उसने पत्थर पर बैठकर चौंसठवाँ पन्ना खोला। यहाँ लिखावट कुछ काँपती हुई लगी, जैसे लिखने वाला बहुत जल्दी में हो।
4:49आख़िरी सुराग
'आख़िरी सुराग। चाबी वहीं है जहाँ हर कहानी का पता लिखा जाता है — मेरे नाम के पहले अक्षर वाले खाने में। कमरा उसी के लिए है, जो यहाँ तक आया।' मीरा देर तक उन शब्दों को देखती रही। जहाँ हर कहानी का पता लिखा जाता है — यह तो पुस्तकालय की पुरानी कार्ड-सूची थी! लकड़ी की वो अलमारी, जिसकी सैकड़ों छोटी दराज़ों में हर किताब का कार्ड रखा जाता था। अब कोई उसे खोलता तक नहीं था। पर किसका नाम? मीरा ने पिछले पन्ने की जेब से पुराना लेन-देन कार्ड निकाला। स्याही इतनी धुँधली थी कि नाम पढ़ा नहीं जा रहा था। बस आख़िरी शब्द साफ़ था: 'स्वयंसेवक।' मीरा ठिठक गई। पचास साल पहले, कोई बिल्कुल उसी की तरह यहाँ काम करता था।
5:43पीतल की चाबी
अगली सुबह मीरा सबसे पहले पुस्तकालय पहुँची और मुख्य पुस्तकाध्यक्ष शर्मा जी को सब कुछ बताया। कार्ड-सूची में अक्षरों के हिसाब से दराज़ें थीं। नाम पढ़ा नहीं जा सकता था, इसलिए हर दराज़ देखनी थी। 'अ', 'क', 'ग', 'प'... हर दराज़ में बस पीले कार्ड और धूल। फिर 'स' वाली दराज़ खुली, और सबसे पीछे, कार्डों के नीचे, कपड़े में लिपटी एक पीतल की चाबी मिली। साथ बँधी पर्ची पर लिखा था: 'वाचनालय दो।' दोनों जानते थे वो कौन-सा कमरा था। पुस्तकालय के आख़िरी कोने में एक दरवाज़ा, जिस पर मोटा ताला और पुरानी सील लगी थी। बच्चों में अफ़वाह थी कि अंदर भूत रहता है। बड़े बस इतना जानते थे कि वह उन्नीस सौ सतहत्तर से बंद है। शर्मा जी ने सिर हिलाया। मीरा ने काँपते हाथ से चाबी ताले में डाली। वह घूम गई।
6:45बंद कमरे का राज़
दरवाज़ा चरमराकर खुला, और धूप की एक लकीर अंदर गिरी। मीरा और शर्मा जी दोनों चुप रह गए। यह कोई डरावना कमरा नहीं था। यह बच्चों का एक छोटा-सा वाचनालय था, जो कभी खुला ही नहीं। रंगीन गद्दियाँ, नीची अलमारियाँ, उनमें करीने से सजी सैकड़ों किताबें, और दीवार पर हाथ से बनी पेंटिंग — पेड़ के नीचे पढ़ते बच्चे। मेज़ पर एक रजिस्टर रखा था: 'शांतिपुर बाल वाचनालय। उद्घाटन: अप्रैल उन्नीस सौ छिहत्तर।' पर उसके नीचे एक भी नाम दर्ज नहीं था। रजिस्टर में एक पुरानी चिट्ठी दबी थी, उसी हाशिये वाली लिखावट में: 'भटनागर सर, माफ़ कीजिए। पापा का तबादला हो गया, हमें आज रात ही जाना है। सुरागों वाली किताब गलती से मेरे सामान में चली गई। हमने तय किया था न, पहला बच्चा पहेली सुलझाकर ही इसे खोलेगा। — स।'
7:47गुमनाम दानदाता
शर्मा जी ने धीरे से कहा, 'भटनागर सर मेरे गुरु थे। वे कहते थे, किसी बच्चे से किया वादा नहीं तोड़ते।' फिर उन्होंने अपनी दराज़ से एक फ़ाइल निकाली। 'मीरा, हर साल इस पुस्तकालय को एक गुमनाम चंदा आता है। चालीस साल से। कोई नाम नहीं, बस हर बार एक ही पंक्ति — पढ़ते रहो।' मीरा ने चिट्ठी उस पंक्ति के पास रख दी। वही घुमावदार अक्षर, वही बिंदी लगाने का अंदाज़। मीरा का दिमाग़ दौड़ने लगा। किताब बिना नाम के लौटी थी, यानी किसी ने ख़ुद आकर डिब्बे में डाली थी। और पिछले दो महीनों से रोज़ सुबह एक बुज़ुर्ग महिला आती थीं, कोने की कुर्सी पर बैठकर अख़बार पढ़तीं, और रजिस्टर में बस एक अक्षर से हस्ताक्षर करतीं: 'स'। मीरा ने घड़ी देखी। दस बजने वाले थे।
8:47सुधा दादी
ठीक दस बजे वे आईं। सफ़ेद साड़ी, मोटा चश्मा, हाथ में कपड़े का थैला। मीरा ने बिना कुछ कहे कविताओं की वह किताब उनके सामने रख दी। बुज़ुर्ग महिला की उँगलियाँ जिल्द पर ठहर गईं। 'तुमने पूरी कर ली?' उन्होंने फुसफुसाकर पूछा। मीरा ने सिर हिलाया। उनकी आँखें भर आईं। 'मेरा नाम सुधा है। सोलह की थी, जब भटनागर सर के साथ ये कमरा बनाया। फिर हम रातों-रात चले गए, और मैं ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाई। इसलिए हर साल थोड़ा-थोड़ा भेजती रही, ताकि यह दरवाज़ा कभी पूरी तरह बंद न हो।' वे हल्का-सा हँसीं। 'वापस आई तो कहने की हिम्मत नहीं हुई। बस किताब लौटा दी, और इंतज़ार किया कि शायद कोई ढूँढ ले।'
9:37नया अध्याय
महीने के अंत में नगर परिषद की बैठक हुई, पर इस बार मेज़ पर सिर्फ़ खर्चे का हिसाब नहीं था। अख़बार में ख़बर छप चुकी थी — पचास साल पुराना बंद कमरा, एक पहेली, और एक दानदाता जिसका नाम आख़िरकार सामने आया। अगले रविवार बाल वाचनालय का उद्घाटन हुआ, आधी सदी की देरी से। लेटरबॉक्स वाले दादाजी आए, और शहर भर के बच्चे। सुधा दादी ने कैंची मीरा के हाथ में रख दी। बंद करने का नोटिस मीरा की जेब में ही पड़ा रहा; किसी को उसकी ज़रूरत नहीं पड़ी। उस शाम, जब सब चले गए, मीरा ने कविताओं की वही किताब उठाई, नया लेन-देन कार्ड लगाया, और तारीख वाले खाने में पेंसिल से लिखा: 'जब अगला बच्चा तैयार हो।' कुछ किताबें देर से नहीं लौटतीं — वे बस सही पाठक का इंतज़ार करती हैं।
अन्य भाषाओं में
- English: A Library Book Came Back 50 Years Late, With Clues in the Margins
- संस्कृतम्: पञ्चाशद्वर्षैः विलम्बितं पुस्तकम् — पार्श्वलेखानां रहस्यम्
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शृंखला: science (हिन्दी)