वो लापता नाव जिसे तूफ़ान से पहले घर लाना है
सारांश
गोवा के कोंकण तट पर एक बूढ़ा मछुआरा समंदर से लौटता नहीं, और उसकी आख़िरी रेडियो कॉल में बस एक अजीब बात है: पहाड़ी चैपल की रोशनी ग़लत जगह पर है। चक्रवात आने में तीन दिन बचे हैं, और पंद्रह साल के सेब को यह पहेली सुलझानी है कि नाव आख़िर गई कहाँ।
पूरा पाठ
0:00आख़िरी रेडियो कॉल
0:00चैपल की रोशनी... ग़लत जगह पर क्यों है? रेडियो से एक भर्राई आवाज़ चीख़ती है। फिर... 0:08बस खरखराहट। बोटयार्ड का एक छोटा सा दफ़्तर है। वहाँ एक पुराना वायरलेस सेट रखा है। उसके सामने पंद्रह साल का एक लड़का खड़ा है। 0:22साँस रोके, वो सुन रहा है। आवाज़ फिर लौटती है, टूटी-टूटी। 'मैं पूरब की ओर ही जा रहा हूँ... कम्पास सीधा है... 0:32पर पहाड़ी वाली रोशनी... ग़लत जगह पर है!' लड़का माइक पकड़ता है। पुकारता है, 'काका! 0:41काका, आप कहाँ हैं?' जवाब में... कुछ नहीं। न आवाज़। 0:47न खरखराहट। जैसे समंदर ने रेडियो का गला दबा दिया हो। उस रात के बाद... कैतानो परेरा की आवाज़ किसी ने नहीं सुनी।
0:58एक चुपचाप तोहफ़ा
0:58इस लड़के का नाम है सेबास्टियन डिसूज़ा। सब उसे सेब कहते हैं। गोवा का कोंकण तट है। वहाँ मछुआरों का एक छोटा सा गाँव है। 1:09और वहीं है मरियम शेख़ का बोटयार्ड। स्कूल के बाद, और हर छुट्टी में, सेब यहीं आता है। नावें घिसता है, रंगता है, पेंच कसता है। उसका सबसे पसंदीदा ग्राहक कौन? 1:25अड़सठ साल के कैतानो परेरा। ज़िद्दी, खड़ूस... और आज भी अपनी छोटी लकड़ी की नाव में अकेले समंदर जाते हैं। काका को किसी गैजेट पर भरोसा नहीं। 1:39'मेरा कम्पास मेरे बाप का है,' वो कहते हैं, 'उसने आज तक झूठ नहीं बोला।' पिछले हफ़्ते सेब उन्हें शुक्रिया कहना चाहता था। तो उसने चुपके से एक पुरानी कार का लाउडस्पीकर फ़िट कर दिया। नाव के डैशबोर्ड के नीचे। 1:59कम्पास के ठीक बगल में, जहाँ तार आसानी से पहुँच जाते थे। अब काका समंदर में भी क्रिकेट कमेंट्री सुन सकते थे। काका हँसे, 'रात भर चलने वाला मैच हो, तो मैं इसे बंद ही नहीं करूँगा। समंदर में अकेलापन नहीं लगेगा।' 2:19फिर उन्होंने कम्पास पर उँगली ठोकी। बड़बड़ाए, 'आज ये सुई थोड़ी आलसी लग रही है।' सेब ने ध्यान नहीं दिया। दो दिन बाद... 2:31कैतानो दूर के मछली वाले किनारों से लौटे ही नहीं।
2:36तीन दिन की मोहलत
2:36पहला दिन। सुबह होते ही तटरक्षक बल की नाव निकलती है। असिस्टेंट कमांडेंट शालिनी नायक की आँखों के नीचे कई रातों की थकान है। वो नक्शे पर एक सीधी लकीर खींचती हैं। 2:52गाँव से पश्चिम की ओर। सीधे उन किनारों तक, जहाँ कैतानो चालीस साल से जाते आए हैं। दिनभर नावें उसी लकीर पर आगे-पीछे घूमती हैं। ऊपर एक हवाई जहाज़ भी चक्कर लगाता है। 3:09पर पानी पर... कुछ नहीं। न कोई तख़्ता। न तेल की परत। 3:16न कोई नीली नाव। शाम को मौसम विभाग की चेतावनी आती है। अरब सागर में एक चक्रवात बन रहा है! तीन दिन में वो तट से टकराएगा। 3:30तीसरे दिन की शाम के बाद, एक भी नाव को समंदर में जाने की इजाज़त नहीं होगी। शालिनी नायक धीरे से कहती हैं, 'हमारे पास वक़्त कम है... और ढूँढने की जगह ख़त्म हो रही है।'
3:44ग़लत जगह की रोशनी
3:44उस रात सेब तटरक्षक चौकी पहुँचता है। 'मैडम, काका ने कहा था, चैपल की रोशनी ग़लत जगह है। वो पहाड़ी वाला चैपल, जिसकी बत्ती हर मछुआरे की निशानी है।' शालिनी ध्यान से सुनती हैं। 4:02पर फिर सिर हिला देती हैं। 'बेटा, अड़सठ साल की आँखें, रात, बारिश... मैं एक बात पर पूरा खोज-क्षेत्र नहीं बदल सकती। मुझे सबूत चाहिए।' 4:14बाहर ट्रॉलर का कप्तान एग्नेलो फ़र्नांडिस जाल समेट रहा है। वो हँसता है, 'चैपल चालीस साल से उसी पहाड़ी पर खड़ा है, छोकरे। रोशनी नहीं हिलती।' घर लौटते हुए सेब उसी पहाड़ी की ओर देखता है। 4:33रोशनी सचमुच नहीं हिलती। पर अगर रोशनी अपनी जगह पर थी... तो ग़लत जगह पर कौन था?
4:41रेत पर नक्शा
4:41दूसरा दिन। बोटयार्ड की गीली रेत। सेब लकड़ी की एक टहनी से नक्शा बनाता है। यहाँ गाँव। 4:52वहाँ पहाड़ी का चैपल। और पश्चिम में, दूर, मछली वाले किनारे। लौटते वक़्त काका पूरब की ओर आ रहे थे। सही रास्ते पर होते, तो चैपल की रोशनी ठीक सामने दिखती। 5:07पर अगर रोशनी बाईं ओर दिखी, उत्तर की तरफ़... तो मतलब साफ़ था। नाव बहुत दक्षिण में थी। उस इलाक़े में, जहाँ किसी ने ढूँढा ही नहीं! 5:19पर ये कैसे हो सकता था? कैतानो परेरा रास्ता नहीं भूलते। वो हर पल कम्पास देखते हैं। और उनका कम्पास कभी झूठ नहीं बोलता। 5:33सेब रेत पर बनी लकीर को घूरता रहता है। फिर... उसके कानों में एक बड़बड़ाहट गूँजती है। 'आज ये सुई थोड़ी आलसी लग रही है।'
5:44मरियम का रजिस्टर
5:44मरियम शेख़ अपने बोटयार्ड में हर काम लिखती हैं। हर पेंच। हर रंग का डिब्बा। हर तार। 5:54उनकी अलमारी में मोटे-मोटे रजिस्टर हैं। हर नाव का अलग पन्ना। सेब बिना बताए कैतानो की नाव का पन्ना खोलता है। सबसे नीचे, उसकी अपनी टेढ़ी लिखावट है... 6:09'पुराना कार स्पीकर फ़िट किया। डैशबोर्ड के नीचे। कम्पास से बाईं ओर, नौ सेंटीमीटर।' मरियम ने ही उसे सिखाया था, नाप हमेशा लिखो। 6:22तभी पीछे से आवाज़ आती है। 'क्या ढूँढ रहे हो, सेब?' मरियम दरवाज़े पर खड़ी हैं। बाँहें बाँधे। 6:33'तुमने कैतानो की नाव पर क्या लगाया था?' 'कुछ नहीं, बस... एक छोटा सा काम,' सेब बुदबुदाता है। वो रजिस्टर बंद कर देता है। 6:45उसका दिल ज़ोर से धड़क रहा है। उस शाम वो गोदाम से वैसा ही एक पुराना स्पीकर उठाता है। और एक पुराना कम्पास। फिर... 6:57शेड का दरवाज़ा अंदर से बंद कर लेता है।
7:00बंद शेड में
7:00शेड के बाहर हवा तेज़ हो रही है। टीन की छत पर बारिश की बूँदें ढोल की तरह बज रही हैं। चक्रवात अब बस एक दिन दूर है। सेब लकड़ी की बेंच पर एक तख़्ता रखता है। 7:16बिल्कुल कैतानो के डैशबोर्ड जैसा। बीच में कम्पास। सुई शांत है। सीधे उत्तर की ओर। 7:26फिर वो फ़ीता निकालता है। नौ सेंटीमीटर। ये वही हाथ हैं, जो रंग की बारीक से बारीक लकीर खींच लेते हैं। पर आज... 7:37ये काँप रहे हैं। अगर वो ग़लत निकला, तो कल का पूरा दिन बर्बाद। और अगर सही निकला... सेब साँस रोकता है। 7:48और लाउडस्पीकर को कम्पास के ठीक बाईं ओर रख देता है।
7:52सुई का सच
7:52सुई काँपती है। फिर धीरे-धीरे... वो खिसकने लगती है। जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसे खींचा हो। 8:02दस डिग्री। पंद्रह। पच्चीस! स्पीकर के अंदर का भारी चुंबक सुई को अपनी ओर मोड़ रहा था। 8:11सेब ज़मीन पर बैठ जाता है। काका की नाव भटकी नहीं थी... उसे भटकाया गया था। हर घंटे, थोड़ा और दक्षिण। 8:22और भटकाने वाला? वो ख़ुद। उसका प्यारा सा तोहफ़ा। एक पल को मन करता है, स्पीकर उठाकर फेंक दे। 8:32किसी को कुछ न बताए। पर तीसरे दिन की सुबह, वो तटरक्षक चौकी पहुँचता है। शालिनी नायक की मेज़ पर वही कम्पास और वही स्पीकर रख देता है। साथ में मरियम का रजिस्टर खुला है। 8:51'ग़लती मेरी है, मैडम,' उसकी आवाज़ टूट रही है। 'और सिर्फ़ मैं जानता हूँ कि सुई कितनी, और किस ओर मुड़ी।' शालिनी सुई को खिसकते देखती हैं। रजिस्टर में नाप पढ़ती हैं। 9:08फिर कैलकुलेटर उठाती हैं। पच्चीस डिग्री। छह घंटे का सफ़र। यानी पुराने रास्ते से लगभग पच्चीस किलोमीटर दक्षिण! 9:20वो उठ खड़ी होती हैं। 'आख़िरी मौक़ा है। आज शाम तक। और तुम हमारे साथ चलोगे।'
9:29अँधेरे में आवाज़
9:29दोपहर ढल रही है। तटरक्षक की नाव नए इलाक़े में पहुँचती है। पीछे-पीछे एग्नेलो का ट्रॉलर भी आया है। उसने कहा था, 'छोकरे की बात ग़लत निकली, तो हिसाब लूँगा।' 9:45पर उसकी आँखों में चिंता थी। लहरें अब ऊँची हैं। आसमान स्याही जैसा। सेब लाइफ़ जैकेट कसकर बाँधे, शालिनी के पास खड़ा है। 9:58घंटों तक... कुछ नहीं। सूरज डूब जाता है। रोशनी कम पड़ने लगती है। 10:05शालिनी घड़ी देखती हैं। तभी सेब को कुछ याद आता है। आज रात विदेश में टेस्ट मैच चल रहा है! और काका ने कहा था, मैच हो, तो वो रेडियो कभी बंद नहीं करेंगे। 10:21'मैडम, इंजन बंद करवाइए! सब चुप हो जाइए!' इंजन थम जाते हैं। बस हवा की सीटी। 10:30और लहरों की थपक। फिर... अँधेरे के बीच से, बहुत दूर, बहुत धीमी, एक जानी-पहचानी आवाज़ तैरती आती है। 'और यह... 10:41शानदार चौका!' सर्चलाइट उस आवाज़ की ओर घूमती है। और काले पानी पर... एक छोटी सी नीली नाव चमक उठती है। 10:52वही नीला रंग, जो सेब ने अपने हाथों से रंगा था।
10:56काका मिल गए
10:56कैतानो परेरा नाव के तले में सिकुड़े लेटे हैं। होंठ सूखे हैं, पर आँखें खुली हैं। ईंधन दो दिन पहले ख़त्म हो गया था। बैटरी बस इतनी बची थी कि स्पीकर धीमे-धीमे बोलता रहे। 11:13तटरक्षक के जवान उन्हें कंबल में लपेटते हैं, और ऊपर खींच लेते हैं। सेब उनका हाथ पकड़ता है। 'काका, आपका कम्पास गड़बड़ नहीं था। मेरा स्पीकर था। 11:28उसके चुंबक ने सुई मोड़ दी। माफ़ कर दीजिए।' बूढ़ा मछुआरा देर तक उसे देखता है। फिर खरखराती आवाज़ में कहता है, 'तेरे स्पीकर ने मुझे भटकाया... 11:42और तेरे ही स्पीकर ने मुझे ढूँढवाया। हिसाब बराबर।' तभी... पहली तेज़ बौछार नाव से टकराती है। 11:52शालिनी चिल्लाती हैं, 'सब पकड़कर रखो! चक्रवात तय वक़्त से पहले आ रहा है!'
11:59तूफ़ान से दौड़
11:59नाव पूरी ताक़त से किनारे की ओर भागती है। लहरें डेक पर टूटती हैं। हवा रस्सियों में चीख़ती है। एग्नेलो का ट्रॉलर कैतानो की नीली नाव को रस्सी से बाँधकर खींच रहा है। 12:15वो रेडियो पर गरजता है, 'इस बूढ़े की नाव मैं समंदर को नहीं दूँगा!' सेब कैतानो के पास बैठा है। बूढ़ा आदमी आधी नींद में बुदबुदाता है, 'रोशनी देखो... रोशनी कहाँ है?' 12:30और फिर... बारिश के परदे के पार, पहाड़ी पर एक छोटी सी पीली चमक उभरती है। ठीक सामने। ठीक वहीं, जहाँ उसे होना चाहिए। 12:42आधी रात से कुछ पहले, नावें बंदरगाह में घुसती हैं। उनके पीछे बंदरगाह का दरवाज़ा बंद होता है। और अरब सागर पूरी ताक़त से गरजने लगता है। पर सेब के मन में... 12:57एक हिसाब अभी बाक़ी था।
13:00सही जगह पर
13:00दो दिन बाद तूफ़ान गुज़र जाता है। बोटयार्ड में टूटी टहनियाँ हैं, कीचड़ है। पर सारी नावें सलामत हैं। सेब कैतानो की नीली नाव पर झुका है। 13:14वो स्पीकर को डैशबोर्ड से निकालता है। और नाव के पिछले हिस्से में फ़िट करता है। कम्पास से पूरे हाथ भर दूर। फिर एक कम्पास पास लाकर जाँचता है। 13:28सुई... नहीं हिलती। पीछे खड़ी मरियम रजिस्टर में लिखती हैं, 'स्पीकर हटाया। कम्पास से एक मीटर दूर। 13:38सेब ने अपनी ग़लती ख़ुद पकड़ी।' उस शाम कैतानो नाव के किनारे बैठे हैं। अभी भी थोड़े कमज़ोर। कमेंट्री सुन रहे हैं। 13:51पहाड़ी पर चैपल की बत्ती जलती है। बूढ़ा मछुआरा उसे देखकर मुस्कुराता है। 'देख, सेब,' वो कहता है, 'आज रोशनी बिल्कुल सही जगह पर है।' सेब हँस पड़ता है। 14:06क्योंकि आज, पहली बार... वो भी ठीक वहीं खड़ा था, जहाँ उसे होना चाहिए था।
और वीडियो
शृंखला: thriller (हिन्दी)