टापू का पुराना नक्शा जिस पर सबकी जान टिकी है
सारांश
एक चक्रवात, एक वीरान टापू, सात फँसे हुए लोग और सिर्फ़ चार दिन का पानी। जब एक बूढ़ी महिला के ज़ंग लगे टीन से जंग के ज़माने का रहस्यमय नक्शा निकलता है, तो सब उसे ख़ज़ाने का नक्शा समझ बैठते हैं।
पूरा पाठ
0:00नक्शा ग़ायब
नक्शा कहाँ गया?! तन्वी की चीख़ गूँज उठी। सुबह की गीली हवा में। रेत पर टीन का ज़ंग लगा डिब्बा खुला पड़ा था। और अंदर... कुछ नहीं था। पास ही, ताड़ के पत्तों की एक छतरी थी। उसके नीचे, पानी के दो पीले कैन। एक ख़ाली। दूसरे में बस इतना पानी, कि सात लोग एक दिन और खींच लें। और राजीव सक्सेना? उसका बैग, उसकी टॉर्च, उसकी चमकदार मुस्कान... सब ग़ायब! जंगल की ओर, गीली मिट्टी पर, जूतों के निशान जा रहे थे। तन्वी ने अपनी नोटबुक कसकर पकड़ ली। तीन दिन पहले उसने सोचा था, सबसे मुश्किल होगा अकेले जाना। वो कितनी ग़लत थी...
0:52पहला अकेला सफ़र
तीन दिन पहले। पोर्ट ब्लेयर की जेटी। तन्वी कुलकर्णी ने वीडियो कॉल पर माँ को आख़िरी बार हाथ हिलाया। सोलह साल की लड़की, पुणे से। पहली बार अकेले सफ़र पर। उसके पापा एक दूर के टापू पर फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर थे। ये छोटी-सी फ़ेरी उसे उन्हीं तक ले जाने वाली थी। तन्वी की एक आदत थी। जो देखती, लिख लेती। नोटबुक की पहली एंट्री थी, फ़ेरी के कप्तान, जोसेफ़ एक्का। भारी आवाज़, कम बातें। कमर पर लटकी एक पिचकी, पुरानी फ़ौजी बोतल। उस बोतल पर एक अजीब निशान खुदा था। बीच में एक खड़ी लकीर। दोनों ओर टेढ़ी लकीरें। जैसे हवा में झूलता कोई छोटा पेड़। तन्वी ने उसे ध्यान से नोटबुक में उतार लिया। 'पोर्ट ब्लेयर के कबाड़ बाज़ार से ली थी,' जोसेफ़ ने बस इतना कहा। तभी... तन्वी की कलम रुक गई। पश्चिम का नीला आसमान, देखते-देखते काला पड़ने लगा।
2:07तूफ़ान और टापू
अक्टूबर का आख़िरी हफ़्ता। चक्रवात आया, लगभग बिना चेतावनी। लहरें फ़ेरी की छत तक उछलीं। रेडियो पर बस खरखराहट। फिर... वो भी बंद। एक झटका लगा। जोसेफ़ का पैर रेलिंग में फँसा, और मुड़ गया। वो दर्द से कराहा। फिर भी उसने फ़ेरी मोड़ी। और एक अनजान टापू की रेत पर चढ़ा दी। नीलकंठ। वीरान टापू। घने जंगल से ढका। यहाँ कोई नहीं रहता। सात लोग थे। जोसेफ़। तन्वी। राजीव सक्सेना, एक बातूनी एंटीक व्यापारी। कॉलेज के दो दोस्त, इमरान और डेविड। एक मज़दूर, बिरसा। और मायाबंदर की एक चुप-सी बूढ़ी करेन महिला, नॉ लिली पॉ। जोसेफ़ ने पानी के कैन गिने। 'चार दिन,' उसने कहा। 'तूफ़ान थमने और मदद आने में भी इतने ही लगेंगे। अगर क़िस्मत अच्छी रही।' तभी तन्वी ने कुछ देखा... लिली पॉ एक ज़ंग लगा टीन का डिब्बा छाती से चिपकाए बैठी थीं। जैसे उसमें उनकी जान हो।
3:30टीन का राज़
उस रात बारिश की चादर बिछी थी। उसके नीचे, लिली पॉ ने डिब्बा खोला। अंदर तह किया हुआ, पीला पड़ चुका एक काग़ज़ था। एक नक्शा... इसी टापू का! 'मेरे पति को मिला था,' वो धीमे से बोलीं। 'पचास साल पहले। जब वो यहाँ बेंत काटने आए थे। कहते थे, ये टापू को जानने वाले का नक्शा है। पर कभी समझ नहीं पाए, इसका मतलब क्या है।' नक्शे पर पाँच क्रॉस थे, चट्टानों के पास। हर क्रॉस के बगल में एक अजीब निशान। किनारों पर छोटे-छोटे तीर, अंक, और लहरदार लकीरें। तन्वी को वो निशान कुछ जाना-पहचाना लगा। पर आँखें थकान से भारी थीं। राजीव ने नक्शे पर टॉर्च टिका दी। उसकी आँखें चमक उठीं। 'जानते हो ये क्या है? जंग के ज़माने में, जापानी क़ब्ज़े के वक़्त, यहाँ सोना छिपाया गया था। ये क्रॉस ख़ज़ाने के हैं। और ये निशान... एक गुप्त कोड है!'
4:43दो खेमे
दूसरे दिन की सुबह। टापू दो खेमों में बँट गया। राजीव ने इमरान और डेविड को सोने के सपने दिखाए। 'बाहर निकलकर करोड़पति बनोगे,' वो बोला। तीनों ने फ़ेरी की टूटी तख़्तियाँ उठाईं। और पहले क्रॉस की ओर चल पड़े। बिरसा और जोसेफ़ ने सिर हिलाया। 'सोना पिया नहीं जाता,' जोसेफ़ बुदबुदाया। अब हर किसी को दिन में बस कुछ घूँट पानी मिलता था। लिली पॉ तन्वी को जंगल के किनारे ले गईं। वो हर पौधे को पहचानती थीं। जैसे पुराने पड़ोसी हों। 'जंगल में जो चीज़ अनजानी हो, उसे कभी मुँह मत लगाना।' तन्वी ने सब लिखा। ये भी, कि बड़े पत्ते फैलाकर बारिश की बूँदें कैसे जमा करें। शाम को राजीव लौटा। कीचड़ से सना हुआ। 'मिल गया! चट्टान में एक पत्थर का ढक्कन है। उस पर लोहे का कड़ा। ख़ज़ाने का दरवाज़ा!' पर... वो उसे हिला तक नहीं पाया था।
5:57प्यास की रात
दूसरी रात सबसे लंबी थी। जोसेफ़ का पैर सूज गया। उसे बुख़ार चढ़ने लगा। एक कैन में बस तली बची थी। राजीव ने माँग की। नक्शा उसके पास रहे। 'मैं ख़ज़ाने को सुरक्षित रखूँगा,' उसने कहा। लिली पॉ ने टीन और कसकर पकड़ लिया। इमरान और बिरसा में बहस छिड़ गई। आवाज़ें ऊँची हुईं। और पहली बार, तन्वी को डर लगा। तूफ़ान से नहीं... इंसानों से। सोने से पहले, तन्वी ने टॉर्च जलाई। पूरा नक्शा बारीकी से नोटबुक में उतार लिया। हर क्रॉस। हर तीर। हर निशान। बस यूँ ही, अपनी आदत से। फिर, तीसरे दिन की भोर। एक अजीब सन्नाटे से उसकी आँख खुली। टीन खुला पड़ा था। नक्शा ग़ायब था। और राजीव भी...
7:04किनारों के सुराग़
बिरसा ने जूतों के निशान देखे। 'वो अकेला गया है। और उसके पास पानी नहीं है।' इमरान और डेविड शर्मिंदा खड़े थे। राजीव ने उन्हें भी धोखा दिया था। तन्वी ने नोटबुक खोली। राजीव को ढूँढना है, तो नक्शा समझना होगा। उसने किनारों को ग़ौर से देखा। हर तीर ऊँचाई से नीचे जाता था, चट्टानों की ओर। लहरदार लकीरें, बादलों जैसी। कोनों में अंक। जैसे कोई कुछ नाप रहा हो। गहराई? 'सोना ढलान से नीचे नहीं बहता,' तन्वी बुदबुदाई। 'पर बारिश बहती है।' उसने क्रॉस के बगल वाले निशान पर उँगली रखी। खड़ी लकीर। दोनों ओर टेढ़ी लकीरें। जैसे हवा में झूलता छोटा पेड़। उसके हाथ ठंडे पड़ गए। ये निशान उसने पहले देखा था... इसी नोटबुक में। पहले ही पन्ने पर!
8:13पानी का अक्षर
तन्वी भागी। सीधे जोसेफ़ के पास। उसकी कमर से पिचकी बोतल उठा ली। वही निशान। हूबहू! 'कप्तान, ये क्या लिखा है?' बुख़ार में तपते जोसेफ़ ने आँखें खोलीं। 'जापानी अक्षर है। बेचने वाले ने बताया था... मिज़ू। मतलब, पानी।' सब चुप हो गए। तन्वी की आवाज़ काँप रही थी। 'ये ख़ज़ाने का नक्शा नहीं है। जंग के वक़्त यहाँ सैनिक तैनात थे। उन्होंने चट्टानों में टंकियाँ खोदी थीं। बारिश का पानी जमा करने के लिए। तीर बताते हैं, पानी किधर बहता है। अंक गहराई हैं। और राजीव जिसे सोने का दरवाज़ा समझ रहा था... वो एक टंकी का ढक्कन है!' लिली पॉ की आँखें भर आईं। 'टापू को जानने वाले का नक्शा,' उन्होंने दोहराया। पचास साल बाद, पति की बात का मतलब खुला था। तीन दिन के तूफ़ान के बाद, टंकियाँ भरी होनी चाहिए थीं। पर... पहले क्रॉस का ढक्कन तो कोई हिला तक नहीं पाया था।
9:31चट्टान का ढक्कन
तन्वी, बिरसा और लिली पॉ पहले क्रॉस की ओर चढ़े। तूफ़ान की आख़िरी हवाएँ पेड़ों को झुका रही थीं। बेलों के पीछे, चट्टान की दरार में... वो पत्थर का ढक्कन था। ज़ंग लगे लोहे के कड़े के साथ। राजीव ने इसे ऊपर खींचने की कोशिश की थी। तन्वी ने नोटबुक का नक्शा देखा। ढक्कन के पास एक छोटा-सा तीर था। बगल की ओर। 'ये उठता नहीं,' उसने कहा। 'खिसकता है!' तीनों ने कंधे लगाए। पत्थर कराहा। फिर धीरे-धीरे एक ओर सरका। नीचे अँधेरा था। उस अँधेरे में, बादलों से झाँकती धूप की एक किरण... किसी चीज़ पर चमकी। शांत, साफ़, गहरा पानी! तन्वी ने जोसेफ़ की बोतल रस्सी से बाँधी, और नीचे उतारी। ऊपर आई, तो भारी थी। उस पर खुदा पानी का अक्षर, बूँदों में चमक रहा था। अस्सी साल पुराना वादा, आख़िर निभ गया। तभी... नीचे घाटी से एक कमज़ोर-सी आवाज़ आई। 'बचाओ!'
10:47राजीव की ग़लती
आवाज़ दूसरे क्रॉस से आ रही थी। राजीव वहाँ चट्टान से टिककर बैठा था। होंठ सूखे। चेहरा पीला। ख़ज़ाने की तलाश में, उसने ढक्कन के चारों ओर की ज़मीन खोद डाली थी। जब तक उसकी ताक़त जवाब न दे गई। नक्शा उसकी मुट्ठी में मुड़ा पड़ा था। लिली पॉ ने ज़िद की थी, टंकी का पानी पहले कपड़े से छाना जाए, फिर उबाला जाए। इसलिए तन्वी ने कुछ नहीं कहा। चुपचाप, कैंप से लाया आख़िरी साफ़ पानी राजीव को पिला दिया। राजीव की आँखें भीग गईं। 'मुझ पर बहुत क़र्ज़ है,' उसने माना। 'मुझे लगा, ये मेरा आख़िरी मौक़ा है।' उसने नक्शा लिली पॉ की ओर बढ़ाया। 'ये आपका है। ख़ज़ाना सच में था। बस मैं उसे पहचान नहीं पाया।' उस शाम, पहली बार, सातों लोग आग के चारों ओर साथ बैठे। उबला पानी पीते हुए। फिर रात के आख़िरी पहर... समुद्र की ओर से एक धीमी, लगातार गड़गड़ाहट सुनाई दी।
12:03बचाव
चौथे दिन की सुबह। आसमान धुला हुआ, नीला। इमरान और डेविड ने रंगीन कपड़े और फ़ेरी की नारंगी लाइफ़जैकेट रेत पर फैला दीं। एक बड़े निशान की तरह। वो गड़गड़ाहट... एक जहाज़ की थी! कोस्ट गार्ड की सफ़ेद नाव, लहरों को चीरती हुई, किनारे की ओर आ रही थी। उसकी रेलिंग पर, दूरबीन थामे, एक जाना-पहचाना चेहरा था। वर्दी में। थका हुआ। पर मुस्कुराता हुआ। तन्वी के पापा! तन्वी दौड़ी। चार दिन से सीने में बँधा सारा डर, वहीं रेत पर पीछे छूट गया। जोसेफ़ को स्ट्रेचर पर ले जाया गया। जाते-जाते उसने अपनी पिचकी बोतल तन्वी के हाथ में रख दी। 'तुमने इसे पढ़ लिया,' उसने कहा। 'अब ये तुम्हारी है।'
13:04असली ख़ज़ाना
पापा ने नोटबुक के पन्ने पलटे। फिर नक्शा देखा। 'नीलकंठ पर कोई नदी नहीं है,' उन्होंने धीरे से कहा। 'इन टंकियों के बिना, कोई यहाँ चार दिन नहीं टिकता। हम इन्हें फिर से साफ़ करवाएँगे। ताकि अगली बार जो भी यहाँ फँसे, उसे पानी मिले।' लिली पॉ ने ज़ंग लगा टीन तन्वी की ओर बढ़ाया। 'मेरे पति कहते थे, ये टापू को जानने वाले का नक्शा है। तुमने इसे जाना।' नाव टापू से दूर होने लगी। तन्वी ने आख़िरी बार नीलकंठ का हरा किनारा देखा। और नोटबुक में एक नई एंट्री लिखी। उस सुबह उसने चीख़कर पूछा था, नक्शा कहाँ गया? अब वो जानती थी... वो कभी ग़ायब हुआ ही नहीं था। वो उसकी नोटबुक में था। उसकी आँखों में था। और उस एक छोटे-से अक्षर में, जिसका मतलब था पानी। यानी... ज़िंदगी।
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शृंखला: thriller (हिन्दी)