दुल्हन की साड़ी जो छह दिन में बुननी है
सारांश
वाराणसी की बुनकर गलियों में सत्तर साल की फ़ातिमा बानो के पास एक शादी की शिकारगाह साड़ी पूरी करने के लिए सिर्फ़ छह दिन हैं, पर उनका हाथ चोट खा जाता है और पहली ही रात साड़ी के नक्शे वाले जैकार्ड कार्ड गायब हो जाते हैं। करघे पर बैठी पोती सना और शहर की गलियों में उतरी दादी को पता लगाना है कि तीन शांत बयानों में से कौन झूठा है, इससे पहले कि बारात निकल जाए।
पूरा पाठ
0:00गिरता हाथ
दादी, संभलिए! सना की चीख करघे की खटखट से भी ऊँची उठी... पर देर हो चुकी थी। सत्तर साल की फ़ातिमा बानो लकड़ी की बेंच से फिसल गईं। उनका दाहिना हाथ करघे के भारी फ़्रेम से जा टकराया। ये था वाराणसी। बुनकरों की वो तंग-तंग गलियाँ। यहाँ हर दरवाज़े के पीछे एक करघा साँस लेता है। इसी करघे पर फ़ातिमा पचास साल से शिकारगाह साड़ियाँ बुन रही थीं। हिरन, शेर, घोड़े पर सवार शिकारी... सब रेशम और ज़री में। कुछ ही पल पहले, कमरे में रेशम का व्यापारी खड़ा था। रऊफ़ सिद्दीक़ी। मुस्कुराता हुआ, हाथ में फ़ोन लिए। बात करते-करते उसका फ़ोन मुड़ गया। मानो गलती से... करघे के ऊपर लटके छेददार जैकार्ड कार्डों की ओर। सना के चाचा इम्तियाज़ अब तक ज़ोर-ज़ोर से बहस कर रहे थे। अचानक... वो चुप हो गए। बस घूरते रहे। फिर दादी साड़ी दिखाने उठीं। और गिर पड़ीं। शाम को हकीम ने पट्टी बाँधी। बोले, हाथ को कम से कम दस दिन आराम चाहिए। और दुल्हन की शादी में बचे थे... सिर्फ़ छह दिन।
1:25करघे पर सना
उस रात दादी ने सना को बेंच पर बिठाया। सना सोलह साल की थी। अब तक वो घर की हरकारा थी। धागा लाना, रंगरेज़ के यहाँ दौड़ना, चाय पहुँचाना। करघे पर बैठने की हिम्मत? कभी नहीं हुई। 'पैर से पैडल, हाथ से ढरकी,' दादी बोलीं, 'और कान से कार्ड।' ऊपर सैकड़ों गत्ते के कार्ड थे। एक ज़ंजीर की तरह जुड़े हुए। हर कार्ड में छेद थे। और हर छेद तय करता था, कौन-सा धागा उठेगा। यही था साड़ी का नक्शा। इसे सना के परदादा ने अपने हाथों से छेदा था। तभी इम्तियाज़ चाचा दरवाज़े पर आ खड़े हुए। 'अम्मी, अब बहुत हुआ। ये करघा बेच दो। पावरलूम वाले अच्छे दाम दे रहे हैं।' दादी ने कोई जवाब नहीं दिया। सना ने पहली बार ढरकी फेंकी। और ज़री का एक धागा ठीक जगह जा बैठा! आधी रात को वो थककर वहीं सो गई। सुबह आँख खुली... तो करघे के ऊपर की ज़ंजीर गायब थी।
2:43गायब कार्ड
'दादी! कार्ड कहाँ गए?' दादी लँगड़ाती हुई आईं। खाली खूँटियों को बस देखती रहीं। बिना कार्डों के करघा क्या था? बस लकड़ी का एक ढाँचा। साड़ी का किनारा तो बुना जा चुका था। पर बीच का पूरा शिकार का दृश्य? पल्लू का हर हिरन? सब उन्हीं छेदों में बंद था। दादी को आधा नक्शा याद था। पर आधी याद से दुल्हन की साड़ी नहीं बनती। दरवाज़े की कुंडी सलामत थी। यानी... जो आया, वो रास्ता जानता था। उस रात तीन लोग इस कमरे के क़रीब थे। पहला, रऊफ़। वो शाम को साड़ी देखने दोबारा आया था। दूसरे, पड़ोसी बुनकर जमील ख़ान। उनका करघा दीवार के उस पार चलता है। और तीसरे... इम्तियाज़ चाचा। दादी ने शॉल ओढ़ी। पचास साल में वो शायद ही इस कारख़ाने से बाहर निकली थीं। 'तू करघा संभाल,' उन्होंने सना से कहा, 'मैं तेरी आँखें और पैर बनूँगी।' फिर वो गली में उतर गईं। उस शहर में, जो उनके बिना बहुत बदल चुका था।
4:05रऊफ़ का बयान
रेशम की मंडी में ख़ूब शोर था। शादियों का मौसम जो था। हर दुकान पर लाल-सुनहरी साड़ियाँ। रऊफ़ ने दादी को देखा, और झट से कुर्सी खींच दी। चाय भी मँगवाई। 'हाय अल्लाह, कार्ड चोरी? दादी, मैं तो उस रात दशाश्वमेध घाट पर था। एक शादी में।' उसने फ़ोन खोला, तस्वीरें दिखाईं। आरती के दीये, ढोल, और वो ख़ुद, मुस्कुराता हुआ। 'आधी रात तक वहीं था।' फिर बड़ी हमदर्दी से बोला, 'घबराइए मत। मेरे पास एक डिज़ाइनर है। साड़ी की जितनी तस्वीरें हों, मुझे भेज दीजिए। वो कंप्यूटर पर नक्शा फिर बना देगा।' दादी ने सिर हिलाया। पर भेजा कुछ नहीं। घर लौटकर उन्होंने सना को सब बताया। सना के हाथ में ढरकी रुक गई। 'दादी, आरती तो सात बजे ख़त्म हो जाती है। उसकी तस्वीरों में आधी रात कहाँ है?' दादी ने धीमे से कहा, 'और एक बात। जाते-जाते वो बोला... असली चोर तो तुम्हारी दीवार के उस पार बैठा है।'
5:25पड़ोसी का करघा
जमील ख़ान और फ़ातिमा बानो। चालीस साल से एक ही दीवार बाँटते आए थे। और उतने ही साल से एक-दूसरे के ग्राहक छीनते आए थे। जमील ने दादी को देखा, तो भौंहें चढ़ गईं। फिर पट्टी पर नज़र पड़ी, और वो नरम पड़ गए। 'उस रात? मैं ईशा की नमाज़ के बाद से सुबह तक करघे पर था। एक बारात का ऑर्डर है।' सना को याद आया। रात भर दीवार के उस पार से खट-खट आती रही थी। एक पल भी रुके बिना। जमील का बेटा भी साथ बैठा था। और जमील की उँगलियों पर ताज़ा ज़री के निशान थे। बात सच लग रही थी। फिर जमील ने कुछ ऐसा कहा... जो दादी सुनना नहीं चाहती थीं। 'एक बार पानी पीने उठा था। क़रीब एक बजे। तुम्हारे कारख़ाने में टॉर्च की रोशनी थी। और गली में जो आदमी निकला, उसकी चाल मैं पहचानता हूँ। वो... इम्तियाज़ था।'
6:36चाचा की कहानी
शाम को इम्तियाज़ चाचा लौटे। दादी उनका इंतज़ार कर रही थीं। 'उस रात तू कहाँ था?' चाचा ने आराम से जवाब दिया। 'अस्सी घाट पर, दोस्तों के साथ। वहीं नाव में सो गया। सुबह लौटा।' आवाज़ शांत थी। पर आँखें नहीं। तभी सना की नज़र पड़ी... चाचा की चप्पलों पर करघे के तेल के धब्बे थे। वही काला तेल, जो सिर्फ़ इसी कमरे में होता है। 'और आपको करघा बेचने की इतनी जल्दी क्यों है?' सना ने पूछा। चाचा का चेहरा सख़्त हो गया। 'क्योंकि इस करघे ने तेरे दादा को झुकी कमर के सिवा कुछ नहीं दिया। परसों एक ख़रीदार आ रहा है। साड़ी बने या न बने, करघा जाएगा।' और वो बाहर चले गए। सना ने दादी की ओर देखा। 'तो... चाचा ही हैं?' दादी चुप रहीं। उन्हें वो पल याद आ रहा था। जब रऊफ़ का फ़ोन करघे की ओर मुड़ा था। और इम्तियाज़ की आवाज़... अचानक बंद हो गई थी।
7:54याद से बुनाई
चौथे दिन, दोनों ने वो किया जो कोई नहीं करता। दादी बेंच के पास बैठ गईं। आँखें बंद कीं, और गिनती बोलने लगीं। 'तीन उठा, दो छोड़, ज़री डाल।' हर गिनती पर सना हाथ से धागे उठाती, और बुनती। बिना कार्डों के एक-एक हिरन में घंटों लगते। पहला हिरन टेढ़ा बना। दूसरा थोड़ा सीधा। और तीसरे की आँख... चमक उठी! दोपहर में रऊफ़ का फ़ोन आया। 'दादी, काम कहाँ तक पहुँचा? एक फ़ोटो भेज दीजिए। दुल्हन वाले पूछ रहे हैं।' सना ने फ़ोटो खींचने को फ़ोन उठाया। पर दादी ने उसका हाथ रोक दिया। 'दुल्हन वाले हमसे सीधे बात करते हैं, रऊफ़ से नहीं। तो उसे फ़ोटो क्यों चाहिए?' सवाल हवा में लटका रहा। शाम को दादी फिर मंडी गईं। इस बार रऊफ़ की दुकान के पीछे वाली गली में। वहाँ उसका गोदाम था। और गोदाम का शटर... आधा खुला था।
9:06गोदाम का राज़
अंदर पावरलूम घरघरा रहा था। तेज़, मशीनी आवाज़। दादी ने झुककर देखा... और उनकी साँस रुक गई। मशीन पर एक साड़ी बन रही थी। सस्ते पॉलिएस्टर में। पर उस पर वही शिकारगाह था! वही घोड़ा। वही शिकारी। हिरन की वही मुड़ी हुई गर्दन, जिसे उनके परदादा ने छेदों में बसाया था। पर दृश्य बीच में अचानक रुक जाता था। ठीक उतने हिस्से पर, जितने कार्ड उस दिन रऊफ़ के फ़ोन के सामने खुले थे। दादी को सब समझ आ गया। रऊफ़ ने कार्ड नहीं चुराए थे। उसने उन्हें फ़िल्माया था। और बाक़ी आधा नक्शा पाने के लिए, उस रात लौटा था। इसीलिए तस्वीरें माँग रहा था। इसीलिए डिज़ाइनर की पेशकश। पर फिर... कार्ड किसके पास थे? अगर रऊफ़ ने नहीं लिए, तो टॉर्च लेकर कौन था? दादी घर लौटीं। कारख़ाना खाली था। सना हाँफ रही थी। 'चाचा... अभी-अभी एक थैला लेकर घाट की ओर गए हैं!'
10:24गंगा पर भोर
भोर से पहले घाट पर कोहरा था। दादी पचास साल में शायद दो बार ही गंगा तक आई थीं। आज सना का हाथ थामे, वो सीढ़ियाँ उतरीं। एक पुरानी नाव पर इम्तियाज़ झुके हुए थे। 'इम्तियाज़,' दादी ने पुकारा। वो पलटे। और उनके हाथ से प्लास्टिक में लिपटी गठरी खुल गई। सैकड़ों छेददार कार्ड! एक लंबी ज़ंजीर में जुड़े हुए। नाव के किनारे से सीढ़ियों तक खुलते चले गए। जैसे कोई सफ़ेद माला। तभी सूरज की पहली किरण उन छेदों से गुज़री। और गीले पत्थरों पर रोशनी के छोटे-छोटे बिंदु नाच उठे। हिरन, शेर, घोड़ा... पूरा शिकारगाह, धूप से बुना हुआ! सना ने पहली बार अपनी आँखों से वो नक्शा देखा, जिसे वो रोज़ बुन रही थी। इम्तियाज़ की आँखें भर आईं। 'मैं इन्हें फेंकने नहीं आया था, अम्मी। छिपाने आया था। पर कोई रात भर मेरा पीछा कर रहा है।' ऊपर सीढ़ियों पर, कोहरे में... किसी फ़ोन की स्क्रीन जल रही थी।
11:41चाचा का सच
वो रऊफ़ था। वो नीचे उतरा। वही मीठी मुस्कान लिए। 'शुक्र है, कार्ड मिल गए! लाइए, मैं सुरक्षित रख देता हूँ।' इम्तियाज़ उसके और कार्डों के बीच आ खड़े हुए। और फिर... उन्होंने सच बताया। पहले ही दिन उन्होंने भाँप लिया था। रऊफ़ का फ़ोन गलती से नहीं, जानबूझकर कार्डों पर टिका था। उस रात उन्होंने रऊफ़ को फिर पकड़ा। कारख़ाने की खिड़की पर, फ़िल्म बनाते हुए। रऊफ़ भाग गया। तब उन्होंने टॉर्च ली, कार्ड उतारे, और छिपा दिए। 'मैंने झूठ बोला, क्योंकि सबूत नहीं था। और यही आदमी साड़ी के पैसे दे रहा था। करघा बेचना चाहता था, क्योंकि डर था, ये हमें भूखा मार देगा। पर हमारा डिज़ाइन कोई सस्ती मशीन पर बेचे? कभी नहीं!' दादी ने रऊफ़ की ओर देखा। 'तुम्हारा गोदाम मैंने देख लिया है। आज बुनकर संघ भी देखेगा।' और रऊफ़ की मुस्कान... पहली बार उतर गई।
12:56आख़िरी रात
रऊफ़ का धंधा टूट गया। पर दुल्हन इंतज़ार नहीं कर सकती थी। दादी ने ख़ुद दुल्हन की माँ को फ़ोन किया। वो बोलीं, 'हमें साड़ी चाहिए, बिचौलिया नहीं।' जमील ख़ान ने बिना कहे अपने बेटे को भेज दिया। धागे लपेटने के लिए। इम्तियाज़ ने कार्ड वापस करघे पर चढ़ाए। एक-एक करके। जैसे बचपन में अपने अब्बा को करते देखा था। अब बची थी एक रात। और पूरा पल्लू। सना बुनती रही। पैर से पैडल, हाथ से ढरकी, कान से कार्ड। दादी ने अपना पट्टी वाला हाथ उसकी कलाई पर रखा। बस ये बताने को, कि रफ़्तार कब धीमी करनी है। रात के तीन बजे। आख़िरी कार्ड से ठीक पहले... ज़री का धागा खिंचा। और टूट गया। और भोर में... बारात निकलनी थी।
14:00दुल्हन की साड़ी
सना के हाथ काँप उठे। दादी ने कहा, 'जोड़ मत छिपा। बुनकर की गाँठ बारीक होती है, शर्मिंदा नहीं।' सना ने धागा जोड़ा। ढरकी फेंकी। और आख़िरी कार्ड, खटके के साथ गिरा। सुबह सात बजे, साड़ी तह होकर दुल्हन के घर पहुँची। पल्लू के कोने में, बाक़ी हिरनों के बीच, एक हिरन थोड़ा टेढ़ा था। सना का पहला हिरन। दुल्हन ने उसी पर उँगली रखी... और मुस्कुरा दी। उस शाम इम्तियाज़ ने ख़रीदार को लौटा दिया। कारख़ाने में सना फिर बेंच पर बैठी। दादी उठकर उसके पास आईं, थोड़ा लड़खड़ाते हुए। इस बार सना ने कहा, 'दादी, संभलिए!' और दादी हँस पड़ीं। 'अब संभालने वाली तू है।' करघा फिर बोल उठा। खट-खट... खट-खट... जैसे कोई पुराना दिल, नई साँसों से धड़क रहा हो।
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