भीड़ में खोया नाम
सारांश
दुर्गा पूजा की आख़िरी रात, उत्तर कोलकाता के एक पंडाल की खोया-पाया मेज़ पर एक छोटा लड़का आता है। उसके पास एक बड़ा ऊनी शॉल है, एक टूटा चश्मा है, और ज़ुबान पर बस एक शब्द है: 'फूलमनी'।
पूरा पाठ
0:00पंडाल की आख़िरी रात
दशमी की रात थी। उत्तर कोलकाता की उस पुरानी गली में ढाक इतने ज़ोर से बज रहे थे कि छाती में धड़कन की जगह वही गूँज रही थी। पंडाल के कोने में एक छोटी-सी मेज़ थी, जिस पर गत्ते का बोर्ड टँगा था — 'खोया-पाया'। मेज़ के पीछे बैठी थी तेरह साल की रूमी सेन, गोद में स्केचबुक, हाथ में पेंसिल। उसके बगल में थे तरुण मित्रा, जिनका रजिस्टर हर साल की तरह साफ़-सुथरा था और चेहरा हर साल की तरह थका हुआ। 'बारह बजे मेज़ बंद,' उन्होंने तीसरी बार कहा। 'फिर विसर्जन का जुलूस निकलेगा, और घाट तक किसी को किसी की सुध नहीं रहेगी।' तभी पास के पुलिस बूथ से एक सिपाही एक छोटे लड़के को लेकर आया। छह साल का, नंगे पाँव, सीने से एक बड़ा-सा ऊनी शॉल चिपकाए, मुट्ठी में एक टूटा चश्मा। 'बूथ के बाहर खड़ा बार-बार कुछ चिल्ला रहा था,' सिपाही ने कहा। 'खोया हुआ लगता है।' लड़के ने रूमी की कलाई पकड़ी और एक ही शब्द कहा — 'फूलमनी।'
1:08एक अनजाना शब्द
तरुण दा ने बांग्ला में पूछा, फिर हिंदी में, फिर टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में। लड़का हर बार सिर हिलाता और वही शब्द दोहराता। पास खड़े एक बुज़ुर्ग ने कान लगाकर सुना और बोले, 'यह संथाली बोल रहा है। मुझे नहीं आती।' तरुण दा ने रजिस्टर खोला और लिखा — 'नाम: फूलमनी (?)। आयु: लगभग छह।' माइक पर घोषणा हुई: 'फूलमनी नाम का एक बच्चा खोया-पाया मेज़ पर है, परिवार वाले संपर्क करें।' पर रूमी की नज़र शॉल पर अटकी थी। वह इतना बड़ा था कि लड़के के पैरों तक लटक रहा था। उसमें सरसों के तेल और धुएँ की गंध थी, और एक कोने में लाल धागे से एक छोटा फूल कढ़ा था। और चश्मा — मोटे शीशे, पतली सुनहरी डंडी। किसी बच्चे का चश्मा नहीं था वह। लड़का बैठा नहीं। वह बार-बार रूमी का हाथ खींचकर भीड़ की तरफ़ इशारा करता रहा, जैसे कोई घड़ी उसके भीतर टिक-टिक कर रही हो।
2:12पहली तस्वीर
रूमी ने अपनी स्केचबुक का एक खाली पन्ना उसकी ओर बढ़ाया और पेंसिल उसके हाथ में रख दी। लड़के ने एक पल पेंसिल को देखा, फिर तेज़ी से लकीरें खींचने लगा। पहले एक लंबी आकृति, जिसके सिर पर गोल जूड़ा था। उसके बगल में एक छोटी आकृति। दोनों के हाथ जुड़े हुए। फिर उसने दोनों हाथों के बीच एक मोटी काली लकीर खींच दी, इतनी ज़ोर से कि पन्ना फट गया। 'माँ से बिछड़ गया है, बस,' तरुण दा ने झाँककर कहा। 'हर साल बीस आते हैं। आ जाएँगी ढूँढ़ते हुए।' पर लड़का अभी रुका नहीं था। पन्ने के नीचे उसने लहराती हुई लकीरें बनाईं — एक, दो, तीन — और लंबी आकृति को उन लहरों की तरफ़ चलता हुआ दिखाया। रूमी की साँस अटक गई। लहरें। नदी। और ठीक उसी पल, पूरे पंडाल में शंख बज उठे। जुलूस चल पड़ा था।
3:09घड़ी की सुई
घड़ी में दस बजकर चालीस मिनट हुए थे। मंच से माँ दुर्गा की प्रतिमा उठाई जा रही थी, और भीड़ किसी नदी की तरह गली में उमड़ने लगी थी। घोषणा दोबारा हुई, फिर तीसरी बार। कोई नहीं आया। 'इसके घर वाले यहीं कहीं पंडाल में होंगे,' तरुण दा बोले। 'हम मेज़ नहीं छोड़ेंगे। नियम है।' लड़के ने एक नया पन्ना माँगा। इस बार उसने वही लंबी आकृति बनाई, पर बिना जूड़े के, बाल बिखरे हुए। फिर उसने अपनी उँगली अपने माथे पर रखी, दो बार ठकठकाई, और हथेली हवा में ऐसे खोल दी जैसे कोई चिड़िया उड़ा रहा हो। फिर उसने टूटा चश्मा उठाया, अपनी आँखों के आगे लगाया, और टटोलते हुए हाथ आगे बढ़ाए, जैसे कुछ दिख ही न रहा हो। रूमी को पूरी बात समझ नहीं आई। पर इतना ज़रूर समझ आया कि यह डर किसी खोए हुए बच्चे का डर नहीं था। यह किसी और के लिए डर था।
3:56रूमी का फ़ैसला
'तरुण दा, यह किसी को ढूँढ़ रहा है जो नदी की तरफ़ जा रहा है,' रूमी ने कहा। 'अगर हम बारह बजे तक बैठे रहे, तो बहुत देर हो जाएगी।' 'तुम तेरह साल की हो, रूमी। भीड़ में मैं तुम्हें अकेले नहीं भेज सकता।' रूमी ने बहस नहीं की। उसने गले में लटका पीला वॉलंटियर कार्ड सीधा किया, मेज़ से दूसरा वॉकी-टॉकी उठाया, और अपने चचेरे भाई बापी को आवाज़ दी, जो सत्रह साल का था और जुलूस में रस्सी पकड़ने की ड्यूटी पर था। 'बापी दा साथ रहेंगे, और मैं हर पाँच मिनट में बात करूँगी। बस गली के मोड़ तक।' तरुण दा ने लंबी साँस ली और सिर हिला दिया। लड़के ने पहली बार रूमी की तरफ़ देखकर हल्का-सा मुस्कुराया, और अपनी छाती पर हाथ रखकर कहा, 'सोमरा।' तो उसका नाम सोमरा था। पर फिर फूलमनी कौन थी?
4:55लालटेन वाली गली
गली में कागज़ की लालटेनें झूल रही थीं, और उनकी पीली रोशनी में हज़ारों चेहरे बहते जा रहे थे। बापी दा आगे-आगे रास्ता बना रहे थे, रूमी सोमरा का हाथ कसकर थामे थी। मोड़ पर एक चाय वाले का ठेला था। रूमी ने स्केचबुक का पहला पन्ना दिखाया — जूड़े वाली लंबी आकृति। चाय वाले ने माथे पर बल डाले। 'एक बूढ़ी अम्मा आई थीं, कोई घंटा भर पहले। बिना शॉल के, ठंड में काँपती हुई। हर बच्चे का चेहरा पकड़-पकड़कर देख रही थीं।' रूमी का दिल तेज़ हुआ। तो कोई इसे ढूँढ़ रहा था! शायद फूलमनी इसकी दादी थी, जो इसे खोजते-खोजते भटक गई थीं। 'फिर?' बापी दा ने पूछा। चाय वाले ने घाट की तरफ़ उँगली उठाई। 'उधर गईं। पर एक अजीब बात पूछ रही थीं, टूटी हिंदी में — यह कौन सा गाँव है? उन्हें पता ही नहीं था कि वह शहर में हैं।'
5:55ग़लत चेहरा
वे आगे बढ़े तो भीड़ और घनी हो गई। ट्रक पर सजी प्रतिमाएँ धीरे-धीरे सरक रही थीं, और उनके आगे नाचते लोग, उड़ता सिंदूर, धुनुची का धुआँ। तभी सोमरा ने चीख़कर एक तरफ़ इशारा किया। सफ़ेद साड़ी, सफ़ेद बाल, झुकी कमर। बापी दा भीड़ चीरते हुए वहाँ पहुँचे — पर जब वह महिला मुड़ीं, तो वह कोई और थीं। उनका अपना पोता उनकी उँगली थामे खड़ा था। सोमरा का चेहरा उतर गया। वह वहीं फ़ुटपाथ पर बैठ गया और रूमी की स्केचबुक खींचकर एक और तस्वीर बनाने लगा। इस बार उसने एक छोटा-सा कमरा बनाया, ऊपर एक झंडा। अंदर टोपी पहने एक आदमी। और बाहर खुद को, उँगली उठाए, चिल्लाते हुए। रूमी ने तस्वीर को घूरा। सोमरा पुलिस बूथ तक लाया नहीं गया था। वह खुद वहाँ गया था। पर किसलिए? तभी वॉकी-टॉकी चरमराया। तरुण दा की हाँफती आवाज़ — 'रूमी! यहाँ कोई है जो संथाली जानती है!'
7:03बिखरे पन्ने
रूमी ने वहीं फ़ुटपाथ पर, लालटेन की रोशनी में, सारे पन्ने क्रम से बिछा दिए। जुड़े हाथ। बीच में काली लकीर। नदी की ओर जाती आकृति। बिखरे बाल। माथे पर ठकठक, उड़ती चिड़िया। आँखों पर टूटा चश्मा। और फिर पुलिस बूथ। जैसे किसी पहेली के टुकड़े अपनी जगह खिसकने लगे हों। शॉल सोमरा का नहीं था। चश्मा सोमरा का नहीं था। फूलमनी सोमरा का नाम नहीं था। 'बापी दा,' उसने धीरे से कहा, 'हम सब उल्टा सोच रहे थे।' वॉकी पर एक नई आवाज़ आई — नरम, धीमी। 'मैं मालती मुर्मू हूँ। पंडाल में सफ़ाई का काम करती हूँ। बच्चे से बात कराओ।' रूमी ने काँपते हाथों से वॉकी सोमरा के कान से लगा दिया। और सोमरा, जो घंटों से एक ही शब्द दोहरा रहा था, अचानक बहती नदी की तरह बोलने लगा।
8:03असली खोया कौन
देर तक सिर्फ़ सोमरा की आवाज़ आती रही। फिर मालती दी बोलीं, और उनकी आवाज़ बदल चुकी थी। 'यह खोया नहीं है, बेटा। यह अपनी दादी को ढूँढ़ रहा है। फूलमनी हांसदा। वह पहली बार गाँव से शहर आई हैं। उन्हें बातें याद नहीं रहतीं — कभी अपना नाम भूल जाती हैं, कभी यह कि वह कहाँ हैं। भीड़ में हाथ छूटा, शॉल और चश्मा गिर गए। यह उन्हें उठाकर ढूँढ़ता रहा, फिर पुलिस बूथ पर जाकर बताने की कोशिश की कि दादी खो गई हैं। पर किसी ने इसकी बात नहीं समझी। सबने इसी को खोया हुआ मान लिया।' रूमी की आँखें भर आईं। माथे पर ठकठक — याद का उड़ जाना। टूटा चश्मा — वह ठीक से देख नहीं सकतीं। बिना शॉल के — अक्टूबर की ठंडी रात में। वॉकी पर तरुण दा की आवाज़ आई, भारी और शर्मिंदा। 'मैं घोषणा बदल रहा हूँ, और पुलिस को बता रहा हूँ।' फिर एक पल रुककर: 'रूमी… प्रतिमाएँ घाट की सीढ़ियों तक पहुँचने वाली हैं। और सीढ़ियाँ पानी से फिसलन भरी हैं।'
9:05घाट की ओर
रूमी ने पेंसिल उठाई। सोमरा के इशारों और मालती दी के बताए शब्दों से उसने एक चेहरा बनाया — झुर्रियों वाला, चौड़ी मुस्कान, कान में पीतल की छोटी बाली, जूड़े में एक फूल। नीचे बड़े अक्षरों में लिखा: फूलमनी हांसदा। घाट के पास पुलिस की रस्सियाँ लगी थीं। बापी दा ने अपना वॉलंटियर कार्ड दिखाया, और रूमी ने तस्वीर एक महिला कॉन्स्टेबल के आगे कर दी। घोषणा अब हर लाउडस्पीकर पर गूँज रही थी — 'फूलमनी हांसदा, उम्र लगभग सत्तर, सफ़ेद साड़ी…' पीछे से तरुण दा भी दौड़ते हुए आ पहुँचे, मालती दी को साथ लिए। रजिस्टर उनकी बगल में दबा था, पर इस बार उन्होंने उसे खोला तक नहीं। कॉन्स्टेबल ने तस्वीर को ग़ौर से देखा, फिर अपने वॉकी पर कुछ पूछा। जवाब आया, और उनका चेहरा कस गया। 'नीचे वाली सीढ़ियों पर एक बूढ़ी महिला अकेली खड़ी हैं। पानी की तरफ़ हाथ बढ़ा रही हैं।'
10:08सीढ़ियों पर
नदी किनारे रोशनी और शोर का समंदर था। प्रतिमाएँ कंधों पर उठाकर पानी की ओर ले जाई जा रही थीं। और सबसे निचली सीढ़ी पर, लहरों से कुछ ही दूर, एक दुबली-सी आकृति खड़ी थी — बिखरे सफ़ेद बाल, नंगे कंधे, आँखें सिकोड़े हुए। सोमरा छूटकर भागने को हुआ, पर रूमी ने उसे थाम लिया। 'रुको। सीढ़ियाँ गीली हैं।' दो प्रशिक्षित बचाव वॉलंटियर और वह महिला कॉन्स्टेबल धीरे-धीरे नीचे उतरे, और फूलमनी को आहिस्ता से ऊपर की सूखी सीढ़ी तक ले आए। वह डरी हुई थीं। हर चेहरे को ऐसे देख रही थीं जैसे कोई अनजानी लिपि पढ़ रही हों। सोमरा आगे बढ़ा, अपनी छोटी बाहों से वह भारी शॉल उनके कंधों पर डाला, और टूटा चश्मा उनकी आँखों पर रख दिया। फूलमनी ने उसे देखा। बहुत देर तक। उनके चेहरे पर कोई पहचान नहीं थी। रूमी ने अपनी साँस रोक ली। क्या इतनी दूर आकर भी, वह उसे भूल चुकी थीं?
11:17नाम जो लौट आया
फिर फूलमनी ने काँपता हुआ हाथ उठाया और सोमरा के माथे को छुआ — ठीक वहीं, जहाँ वह बार-बार ठकठकाता रहा था। उनके होंठ हिले। 'सोमरा।' और वह लड़का, जो पूरी शाम एक बार भी नहीं रोया था, उनकी गोद में मुँह छिपाकर फूट-फूटकर रो पड़ा। आधे घंटे बाद, घोषणा सुनकर सोमरा के पिता भी हाँफते हुए पहुँच गए, जो दूसरी तरफ़ के घाट पर दोनों को खोज रहे थे। मालती दी ने सबकी बातें एक-दूसरे को समझाईं, और किसी ने फूलमनी के हाथ में गरम चाय का कुल्हड़ थमा दिया। बारह बज चुके थे। खोया-पाया की मेज़ खाली पड़ी थी। तरुण दा ने रजिस्टर खोला, 'नाम: फूलमनी (?)' को काटा, और साफ़ अक्षरों में लिखा — 'सोमरा हांसदा, छह साल। खोया नहीं था। ढूँढ़ने आया था।' रूमी ने अपनी स्केचबुक का आख़िरी पन्ना खोला और एक नई तस्वीर बनाई — दो आकृतियाँ, एक लंबी, एक छोटी, हाथ जुड़े हुए, और बीच में कोई काली लकीर नहीं। उस रात उसने सीखा कि भीड़ में सबसे छोटी आवाज़ अक्सर सबसे ज़रूरी बात कह रही होती है — बस कोई रुककर सुनने वाला चाहिए।
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शृंखला: thriller (हिन्दी)