घोंघा डाकिया शेल्बी: सबसे धीमी, फिर भी सबसे भरोसेमंद कैसे बनी?
सारांश
पत्तापुर गाँव में चिट्ठियाँ खोने लगीं, तो एक नन्ही घोंघी शेल्बी ने डाकिया बनने की ठानी, और सब उस पर हँस पड़े। काँटों, बारिश और तेज़ गर्मी के बीच शेल्बी की यह प्यारी कहानी बच्चों को सिखाती है कि जल्दबाज़ी से ज़्यादा ज़रूरी है ध्यान से काम करना।
पूरा पाठ
0:00पत्तापुर गाँव
घने हरे जंगल के बीचों-बीच, एक बहुत पुराने बरगद के पेड़ के नीचे, एक छोटा-सा गाँव बसा था। उसका नाम था पत्तापुर। यहाँ खरगोश, गिलहरियाँ, कछुए, मेंढक, चूहे और तरह-तरह के पंछी मिल-जुलकर रहते थे। पत्तापुर के लोग एक-दूसरे को चिट्ठियाँ लिखना बहुत पसंद करते थे। जन्मदिन की बधाई, दावत का न्योता, दूर रहने वाले नाती-पोतों के हाल-चाल, सब कुछ चिट्ठियों में ही जाता था। और इन चिट्ठियों को घर-घर पहुँचाने का काम एक डाकिये का था। बरगद की जड़ में एक छोटा-सा डाकघर था, जहाँ लाल रंग की एक नन्ही पेटी लटकी रहती थी। हर सुबह उस पेटी में ढेर सारी चिट्ठियाँ होती थीं, और हर कोई अपनी चिट्ठी का बेसब्री से इंतज़ार करता था।
0:54तेज़ चिंटू गिलहरी
पत्तापुर का डाकिया था चिंटू गिलहरी। चिंटू जंगल का सबसे तेज़ दौड़ने वाला था। वह पलक झपकते ही एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगा देता था, और उसकी झबरीली पूँछ हवा में लहराती रहती थी। चिंटू को तेज़ी पर बड़ा गर्व था। वह कहता, "मैं पूरे गाँव की डाक दस मिनट में बाँट सकता हूँ!" और सचमुच, वह बाँट भी देता था। पर एक मुश्किल थी। जल्दी-जल्दी में चिंटू पता ठीक से पढ़ता ही नहीं था। मेंढक की चिट्ठी चूहे के घर पहुँच जाती, और चूहे का पार्सल तालाब में तैरता मिलता। कभी-कभी तो चिट्ठियाँ रास्ते में ही उड़कर कहीं खो जातीं।
1:43उल्लू दादी की सभा
एक दिन तो हद ही हो गई। कछुआ नानी को अपने पोते की चिट्ठी का पूरे एक महीने से इंतज़ार था। पर वह चिट्ठी गलती से भालू के घर पहुँच गई, और भालू ने उसे पुराना कागज़ समझकर अपनी गुफा के कोने में रख दिया। कछुआ नानी बहुत उदास हुईं। तब गाँव की सबसे बुद्धिमान, उल्लू दादी ने बरगद के नीचे सबको इकट्ठा किया। उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया और गंभीर आवाज़ में बोलीं, "चिंटू बहुत मेहनती है, पर डाक का काम सिर्फ़ तेज़ी का नहीं, भरोसे का काम है। चिंटू अब से जंगल में फल-मेवे इकट्ठा करने में मदद करेगा, जहाँ उसकी फुर्ती काम आएगी। और हमें एक नया डाकिया चाहिए। कौन आगे आएगा?" सब एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। कोई कुछ नहीं बोला।
2:41शेल्बी आगे आई
तभी भीड़ के सबसे पीछे से एक पतली-सी आवाज़ आई, "मैं... मैं यह काम करना चाहूँगी।" सबने मुड़कर देखा। वहाँ एक छोटी-सी घोंघी खड़ी थी, जिसकी पीठ पर भूरे और सुनहरे घेरों वाला एक गोल, चमकदार खोल था। उसका नाम था शेल्बी। पहले तो सब चुप रहे, फिर कहीं से खी-खी की हँसी फूट पड़ी। एक खरगोश बोला, "घोंघा डाकिया? चिट्ठी पहुँचने तक तो अगला साल आ जाएगा!" चिंटू भी मुस्कुरा दिया, "शेल्बी, तुम तो मेरी पूँछ जितनी दूरी तय करने में भी पूरा दिन लगा दोगी।" शेल्बी के गाल थोड़े गुलाबी हो गए, पर उसने अपना सिर ऊँचा रखा। उल्लू दादी ने हाथ उठाकर सबको चुप कराया और कहा, "हर किसी को एक मौका मिलना चाहिए। शेल्बी, कल सुबह तुम्हारी परीक्षा होगी।"
3:39घोंघे की खूबियाँ
उस रात शेल्बी अपने घर, एक ठंडे और नम पत्थर के नीचे, आराम कर रही थी। वह जानती थी कि वह तेज़ नहीं है, पर उसे अपने बारे में कुछ खास बातें भी पता थीं। घोंघे का शरीर एक ही बड़े पैर जैसा होता है। इसी एक पैर की लहरों जैसी हरकत से वह आगे सरकता है। और उसके सिर पर दो जोड़ी सींग होते हैं। ऊपर वाले लंबे सींगों के सिरों पर उसकी आँखें होती हैं, और नीचे वाले छोटे सींगों से वह चीज़ों को सूँघता और महसूस करता है। शेल्बी ने अपने लंबे सींग ऊपर उठाए और तारों को देखा। "मैं धीमी हूँ," उसने खुद से कहा, "पर मैं ध्यान से देखती हूँ, ध्यान से सूँघती हूँ, और कभी कोई काम अधूरा नहीं छोड़ती।" फिर वह अपने खोल में सिमटकर सो गई।
4:35पहली परीक्षा
अगली सुबह उल्लू दादी ने शेल्बी को तीन चिट्ठियाँ दीं। एक मेंढक मामा के लिए, एक चूहे भैया के लिए, और एक कछुआ नानी के लिए, वही खोई हुई चिट्ठी, जिसे भालू ने ढूँढ़कर डाकघर लौटा दिया था। "सूरज ढलने से पहले ये तीनों चिट्ठियाँ सही घर पहुँचनी चाहिए," दादी ने कहा। चिंटू होता तो फ़ौरन दौड़ पड़ता। पर शेल्बी ने पहले हर चिट्ठी का पता धीरे-धीरे, अक्षर-अक्षर पढ़ा। फिर उसने ज़मीन पर एक तिनके से छोटा-सा नक्शा बनाया। "मेंढक मामा तालाब के पास, चूहे भैया सरसों के खेत के किनारे, और कछुआ नानी पुराने कुएँ के पास," वह बुदबुदाई। "अगर मैं इसी क्रम में जाऊँ, तो एक भी कदम बेकार नहीं जाएगा।" फिर उसने एक बड़े केले के पत्ते से एक छोटा-सा थैला बनाया, उसमें चिट्ठियाँ सँभालकर रखीं, थैले को अपने खोल पर बाँधा, और चल पड़ी।
5:36काँटों का रास्ता
रास्ते में सबसे पहले आई एक कँटीली झाड़ी। उसकी डालियाँ नुकीले काँटों से भरी थीं, और दूसरी तरफ़ जाने का कोई और रास्ता नहीं था। किनारे पर खड़े दो खरगोश बोले, "अरे शेल्बी, लौट जाओ! ये काँटे तुम्हें चुभ जाएँगे।" पर शेल्बी मुस्कुराई। घोंघे अपने पैर के नीचे एक चिकना, चिपचिपा पदार्थ बनाते हैं, जिसे म्यूकस या लार कहते हैं। यह लार एक नरम गद्दी की तरह काम करती है। इसी की वजह से घोंघे नुकीली सतह पर भी धीरे-धीरे, आराम से सरक सकते हैं, और उन्हें चोट नहीं लगती। शेल्बी बहुत सावधानी से, एक-एक इंच करके, काँटों वाली डाली के ऊपर से सरकती हुई पार हो गई। पीछे एक चमकीली, चाँदी जैसी लकीर छूट गई। खरगोशों की आँखें फटी की फटी रह गईं।
6:35बारिश में डाक
दोपहर होते-होते आसमान में काले बादल घिर आए, और रिमझिम बारिश शुरू हो गई। पत्तापुर के सारे जानवर भागकर अपने-अपने घरों में छिप गए। पर शेल्बी को बारिश बहुत पसंद थी! घोंघों को नमी अच्छी लगती है, क्योंकि उनका शरीर गीला रहना चाहिए। गीली ज़मीन पर उनकी लार आसानी से बनती है, और वे पहले से भी ज़्यादा आराम से चल पाते हैं। इसीलिए बारिश के बाद बगीचों में अक्सर बहुत सारे घोंघे दिखाई देते हैं। बस एक ही चिंता थी, चिट्ठियाँ भीगनी नहीं चाहिए। शेल्बी ने रास्ते से एक चौड़ा अरबी का पत्ता उठाया और उसे छाते की तरह थैले के ऊपर टिका दिया। बारिश की बूँदें पत्ते पर टप-टप गिरती रहीं, और चिट्ठियाँ बिल्कुल सूखी रहीं।
7:30नई डाकिया
शाम ढलने से ठीक पहले, शेल्बी कछुआ नानी के दरवाज़े पर पहुँची। मेंढक मामा और चूहे भैया को उनकी चिट्ठियाँ पहले ही मिल चुकी थीं, एकदम सूखी और बिल्कुल सही पते पर। कछुआ नानी ने चिट्ठी खोली तो उनकी आँखें चमक उठीं। "यह तो मेरे पोते की चिट्ठी है! उसने लिखा है कि वह जल्दी ही मुझसे मिलने आएगा।" नानी ने शेल्बी को धीरे से गले लगाया। "बेटी, आज तक किसी ने मेरी चिट्ठी इतनी साफ़-सुथरी हालत में नहीं पहुँचाई।" उस रात उल्लू दादी ने घोषणा की, "शेल्बी परीक्षा में पास हो गई है। आज से वह पत्तापुर की नई डाकिया है!" इस बार किसी ने हँसी नहीं उड़ाई। बल्कि सबने ज़ोर-ज़ोर से तालियाँ बजाईं।
8:25भरोसा और गर्मी
दिन बीतते गए, और शेल्बी का काम पूरे गाँव में मशहूर हो गया। वह थोड़ी देर से पहुँचती थी, यह सच था, पर उसकी लाई हर चिट्ठी हमेशा सही घर पहुँचती थी। अब कोई चिट्ठी नहीं खोती थी, कोई पार्सल तालाब में नहीं तैरता था। शेल्बी की एक और खूबी थी। चाहे वह कितनी भी दूर क्यों न जाए, वह हर शाम अपने उसी पत्थर के नीचे लौट आती थी। वैज्ञानिकों ने देखा है कि बहुत-से घोंघे सचमुच ऐसा करते हैं। वे अपने घर की जगह याद रखते हैं और रोज़ वहीं वापस लौटते हैं। फिर एक हफ़्ता ऐसा आया जब खूब गर्मी पड़ी। धूप तेज़ थी, और ज़मीन सूखी। घोंघों के लिए सूखा मौसम मुश्किल होता है, क्योंकि उनका शरीर सूखने लगता है। ऐसे में घोंघा अपने खोल के अंदर चला जाता है और मुँह पर लार की एक पतली परत जमा लेता है, जो सूखकर एक छोटे दरवाज़े जैसी बन जाती है। अंदर वह ठंडा और नम रहता है।
9:34सावन मेले के न्योते
शेल्बी ने इस मुश्किल का भी हल निकाल लिया। वह सुबह-सुबह, जब घास पर ओस की बूँदें चमकती थीं, अपनी डाक बाँटती थी, और दोपहर की तेज़ धूप में पत्थर के नीचे आराम करती थी। सोच-समझकर बनाई योजना से कोई चिट्ठी देर से नहीं पहुँची। जब गर्मी खत्म हुई और फिर से ठंडी हवाएँ चलने लगीं, तो उल्लू दादी ने एक बड़ी खबर सुनाई। "इस साल पत्तापुर में सावन मेला होगा! झूले होंगे, गीत होंगे, और ढेर सारे पकवान। बीस घरों में न्योते भेजने हैं, और कल शाम तक सबको मिल जाने चाहिए।" तभी चिंटू उछलकर आगे आया। "दादी, इतना ज़रूरी काम! आधे न्योते मुझे दीजिए। मैं एक घंटे में बाँट दूँगा!" उल्लू दादी ने थोड़ा सोचा, फिर दस न्योते चिंटू को और दस शेल्बी को दे दिए।
10:34चिंटू की जल्दबाज़ी
चिंटू तो हवा की तरह उड़ चला। एक डाल से दूसरी डाल, एक पेड़ से दूसरे पेड़। उसने न्योतों का पता भी ठीक से नहीं देखा। "भोलू भालू... या भोलू बिज्जू? अरे, दोनों एक जैसे ही तो हैं!" और उसने दोनों के न्योते एक ही घर में फेंक दिए। फिर एक ऊँची छलाँग लगाते हुए उसकी झोली का मुँह खुल गया। चार न्योते हवा में फड़फड़ाते हुए नीचे गिरे और सूखे पत्तों के एक बड़े ढेर में गुम हो गए। चिंटू को पता भी नहीं चला। एक घंटे बाद वह हाँफता हुआ डाकघर लौटा, और गर्व से बोला, "हो गया काम!" पर जब उसने अपनी झोली झाँककर देखी, तो उसका चेहरा उतर गया। झोली खाली थी, पर उसे याद ही नहीं था कि कौन-से न्योते कहाँ पहुँचे और कौन-से नहीं।
11:32पत्तों में छिपे न्योते
उधर शेल्बी अपनी रफ़्तार से, एक-एक घर, एक-एक पता पढ़कर, न्योते बाँट रही थी। उसे जल्दी नहीं थी, क्योंकि उसने पूरी योजना पहले से बना रखी थी। पुराने नीम के पास से गुज़रते हुए उसके नीचे वाले छोटे सींग अचानक हिले। उसे सूखे पत्तों के बीच से किसी कागज़ की हल्की-सी गंध आई। शेल्बी रुक गई। उसने अपनी आँखों वाले सींग आगे बढ़ाए और ध्यान से देखा। पत्तों के ढेर में एक गुलाबी कोना झाँक रहा था! एक मज़ेदार बात यह है कि घोंघे के मुँह में हज़ारों छोटे-छोटे दाँत होते हैं, जो एक रेती जैसी जीभ पर लगे होते हैं। कई घोंघे तो कागज़ भी कुतर लेते हैं! पर शेल्बी एक सच्ची डाकिया थी। उसने एक भी न्योते को मुँह नहीं लगाया। उसने धीरे-धीरे पत्ते हटाए और चारों खोए हुए न्योते निकालकर अपने थैले में रख लिए।
12:36मिलकर चलें
शाम होने को थी जब शेल्बी डाकघर पहुँची। वहाँ चिंटू बरगद की जड़ पर सिर झुकाए बैठा था। "मैंने सब गड़बड़ कर दिया," वह धीरे से बोला। "मुझे नहीं पता कौन-से न्योते खो गए। मेला खराब हो जाएगा, और सब मेरी वजह से।" शेल्बी ने अपना थैला खोला और चारों न्योते उसके सामने रख दिए। "ये रहे तुम्हारे खोए हुए न्योते," उसने मुस्कुराकर कहा। "और भोलू भालू और भोलू बिज्जू वाली गलती भी हम मिलकर ठीक कर सकते हैं।" चिंटू की आँखें भर आईं। "पर तुम तो इतनी धीमी हो, और शाम होने वाली है।" "इसीलिए तो हम मिलकर चलेंगे," शेल्बी बोली। "तुम्हारे पास तेज़ पैर हैं, और मेरे पास ध्यान से पढ़ने वाली आँखें।" चिंटू ने शेल्बी को सावधानी से अपनी पीठ पर बिठाया। शेल्बी हर पता पढ़ती, और चिंटू तेज़, पर सँभलकर, सही घर तक दौड़ता। सूरज डूबने से पहले हर न्योता अपनी सही जगह पहुँच चुका था।
13:48मेला और सम्मान
अगले दिन सावन मेले में पूरा पत्तापुर इकट्ठा हुआ। बरगद की डालों पर झूले पड़े, मेंढकों ने मिलकर गीत गाए, और हवा में गरम-गरम पकवानों की खुशबू फैल गई। एक भी मेहमान ऐसा नहीं था जिसे न्योता न मिला हो। तभी उल्लू दादी ने शेल्बी को मंच पर बुलाया और उसके खोल पर एक नन्ही-सी पीतल की घंटी बाँध दी, जिस पर लिखा था, 'पत्तापुर की सबसे भरोसेमंद डाकिया'। चिंटू सबसे ज़ोर से तालियाँ बजा रहा था। फिर वह आगे आया और बोला, "मैंने सीखा है कि तेज़ होना अच्छी बात है, पर ध्यान से काम करना उससे भी अच्छी बात है। अब मैं भी हर पता दो बार पढ़ूँगा।" उस दिन से पत्तापुर की डाक शेल्बी और चिंटू मिलकर बाँटने लगे। और जब भी सुबह की ओस में कोई चाँदी-सी चमकती लकीर दिखती, तो गाँव वाले मुस्कुराकर कहते, "देखो, शेल्बी आई थी।" क्योंकि शेल्बी ने सबको सिखा दिया था कि मंज़िल तक सबसे पहले पहुँचना ज़रूरी नहीं, सही-सलामत पहुँचना ज़रूरी है।
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