Samvada

बिजूका जिसने कौवों के लिए बगीचा लगाया

2026-10-28 · YouTube पर देखें

सारांश

घासू एक अकेला बिजूका है, जिसका काम है कौवों को खेत से दूर रखना। पर जब नन्ही कौवी चिंकी उसकी दोस्त बनती है और खेत के पत्तों में छेद होने लगते हैं, तो घासू एक ऐसा राज़ जान जाता है जो सब कुछ बदल देता है।

पूरा पाठ

0:00अकेला बिजूका

0:00एक हरा-भरा खेत था। उसके बीचों-बीच खड़ा था... घासू। घासू एक बिजूका था। 0:09यानी पुआल से भरा एक पुतला। सिर पर पुरानी तिनकों की टोपी। बदन पर रंग-बिरंगी, पैबंद लगी कमीज़। उसकी बाँहें हमेशा दोनों तरफ़ फैली रहतीं। 0:23जैसे वह किसी को गले लगाना चाहता हो। पर जो भी पक्षी उसे देखता, फ़ौरन उड़ जाता। घासू सोचता, 'क्या ऐसा भी कोई हो सकता है? जिसे देखकर सब भाग जाएँ... 0:39फिर भी वह दोस्त बनना चाहे?'

0:41सुशीला दादी का खेत

0:41यह खेत सुशीला दादी का था। हर सुबह वे पानी का लोटा लेकर आतीं। टमाटर, भिंडी और मक्के को सींचतीं। और घासू से बातें करतीं। 0:55'घासू बेटा, कौवों को दूर रखना। वे मेरी फ़सल खा जाएँगे।' घासू वैसे ही खड़ा रहता, बाँहें फैलाए। पूरी ईमानदारी से अपना काम करता। 1:09कौवे आते, उसे देखते। 'काँव-काँव' करते, और दूर पेड़ों की ओर उड़ जाते। खेत शांत रहता। पर घासू का मन... 1:20उदास रहता।

1:21नन्ही चिंकी

1:21फिर एक दिन, कुछ अनोखा हुआ। एक नन्ही-सी कौवी आई। उसके पंख अभी पूरे चमकीले भी नहीं थे। वह फुदकती हुई आई, और सीधे घासू की बाँह पर बैठ गई! 1:37'तुम मुझसे डरती नहीं?' घासू ने धीरे से पूछा। 'डरूँ क्यों? तुम तो बस पुआल के बने हो! 1:47और तुम्हारी टोपी बड़ी मज़ेदार है!' नन्ही कौवी हँसी। 'मेरा नाम चिंकी है।' उस दिन घासू को पहली बार लगा... 1:58उसकी फैली बाँहें किसी काम की हैं।

2:00दोस्ती और उलझन

2:00उसके बाद चिंकी रोज़ आने लगी। वह घासू को ढेर सारी बातें बताती। नदी किनारे क्या हो रहा है। बादल कैसे दौड़ते हैं। 2:14पहाड़ी के पीछे कौन-से फल पके हैं। घासू खुश था। पर मन में एक काँटा भी चुभता था। 'मेरा काम तो कौवों को भगाना है। 2:26अगर दादी ने चिंकी को देख लिया तो?' इसलिए जब भी दादी आतीं, घासू कहता, 'जल्दी उड़ जाओ!' और चिंकी पेड़ की डाल पर जा छिपती।

2:38पत्तों में छेद

2:38कुछ हफ़्ते बीते। फिर खेत में एक अजीब बात होने लगी। टमाटर के पत्तों में छोटे-छोटे छेद दिखने लगे। भिंडी के पौधे मुरझाने लगे। 2:52सुशीला दादी झुककर देखतीं, और माथा पकड़ लेतीं। 'इतने सारे कीड़े! ये हरी इल्लियाँ तो मेरे सारे पौधे चट कर जाएँगी!' घासू हैरान था। 3:05उसने तो एक भी कौवे को पास नहीं आने दिया था। फिर भी खेत बिगड़ता क्यों जा रहा था?

3:13घासू की चिंता

3:13हर दिन हालत और बिगड़ती गई। दादी ने पौधों को पानी दिया। मिट्टी में खाद भी डाली। पर पत्ते पीले पड़ते रहे। 3:25घासू ने सोचा, 'शायद मैं ठीक से डरावना नहीं हूँ। शायद मुझे और तनकर खड़ा होना चाहिए।' पर एक पुतला और कितना सीधा खड़ा हो सकता है? उस शाम चिंकी आई। 3:40उसने देखा, घासू की टोपी झुकी हुई थी। 'क्या हुआ, दोस्त?' उसने पूछा।

3:48असली राज़

3:48घासू ने सब कुछ बता दिया। चिंकी कुछ पल चुप रही... फिर ज़ोर से हँस पड़ी। 'अरे घासू! 3:57पता है, हम कौवे क्या खाते हैं? इल्लियाँ, भृंग, घुन! वही छोटे कीड़े, जो पत्ते खाते हैं!' 'पहले मेरा पूरा झुंड यहीं दाना चुगता था। 4:10साथ में कीड़े भी चुन लेता था। जब से हम नहीं आते, कीड़ों की तो दावत हो गई है!' घासू जैसे जड़ हो गया। जिन्हें वह दुश्मन समझता था... 4:23वही तो इस खेत के रखवाले थे! उसी पल उसने फ़ैसला किया। अब वह कौवों को भगाएगा नहीं... बुलाएगा!

4:33कौवों का मेला

4:33अगली सुबह चिंकी ने पूरे झुंड को आवाज़ दी। 'काँव! काँव! आ जाओ, घासू बुला रहा है!' 4:43आसमान में काले पंखों की एक लहर उठी। फिर एक-एक करके कौवे उतरने लगे। कोई घासू के कंधे पर। कोई उसकी टोपी पर। 4:56कोई उसकी फैली बाँहों पर। देखते-ही-देखते घासू ऐसा लगने लगा... जैसे काले फूलों से लदा कोई पेड़ हो! फिर झुंड खेत में फैल गया। 5:08और पत्ते-पत्ते से कीड़े चुनने लगा। सुशीला दादी बाल्टी लिए दरवाज़े पर खड़ी थीं। मुँह खोले, बस देखती रह गईं!

5:19सूरजमुखी की क्यारी

5:19कुछ ही दिनों में टमाटर फिर लाल होने लगे। भिंडी फिर से हरी हो गई। दादी समझ गईं, उनके असली मददगार कौन हैं। उन्होंने घासू की ओर देखकर कहा, 'चलो बेटा, इन मेहमानों के लिए भी कुछ उगाते हैं।' 5:37और घासू के ठीक पास, एक क्यारी में, सूरजमुखी के बीज बो दिए। सिर्फ़ कौवों के लिए! चिंकी ने बताया, 'हम बीज और फल खाते हैं न? उड़ते-उड़ते कुछ बीज दूर गिरा देते हैं। 5:53वहाँ नए पौधे उग आते हैं। हम तो बीजों के डाकिए हैं!'

5:58खुली बाँहें

5:58फिर गर्मियाँ आईं। घासू के चारों ओर सूरजमुखी खिल उठे। बड़े-बड़े, सुनहरे फूल! कौवे उनके बीज चुगते। 6:10खेत के कीड़े चुनते। और खेत की मेड़ पर, जहाँ पहले सिर्फ़ घास थी... अब नन्हे नए पौधे झाँक रहे थे। घासू अब भी उसी जगह खड़ा था। 6:23बाँहें दोनों तरफ़ फैलाए। पर अब उसकी बाँहें 'चले जाओ' नहीं कहती थीं। वे कहती थीं, 'आ जाओ!' ढलते सूरज की रोशनी में, चिंकी उसके कंधे पर बैठी थी। 6:37वह धीरे से बोली, 'घासू, तुम दुनिया के सबसे अच्छे बिजूका हो।' घासू मुस्कुराया। कभी-कभी सबसे अच्छी रखवाली... दोस्ती से होती है।

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शृंखला: science (हिन्दी)