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न्यू ग्लेन रॉकेट: उपग्रह कक्षा तक कैसे पहुँचता है?

2026-09-07 · YouTube पर देखें

सारांश

आइए जानें कि न्यू ग्लेन जैसा विशाल रॉकेट ईंधन, इंजन और उपग्रह को एक साथ लेकर पृथ्वी से ऊपर कैसे जाता है। आप देखेंगे कि रॉकेट केवल ऊपर नहीं उड़ता, बल्कि सही गति से आगे बढ़कर उपग्रह को कक्षा में पहुँचाता है।

पूरा पाठ

0:00विशाल रॉकेट परिचय

क्या आपने कभी सोचा है कि एक उपग्रह, जो स्कूल बस जितना बड़ा भी हो सकता है, पृथ्वी के चारों ओर घूमना कैसे शुरू करता है? इसका जवाब है एक बहुत बड़ा रॉकेट—न्यू ग्लेन! यह रॉकेट लगभग 98 मीटर ऊँचा है, यानी एक बहुत ऊँची इमारत जैसा। आज आप देखेंगे कि इसके अंदर ईंधन कहाँ रहता है, इंजन कैसे काम करते हैं, और उपग्रह को सही जगह तक कौन पहुँचाता है। सबसे मज़ेदार बात यह है कि उपग्रह को बस ऊपर फेंकना काफी नहीं होता। उसे आगे की ओर भी बहुत तेज़ गति देनी पड़ती है। वरना वह वापस नीचे आ जाएगा। तो अपनी कल्पना की सीट बेल्ट बाँध लीजिए। हम रॉकेट के नीचे से ऊपर तक एक रोमांचक यात्रा शुरू कर रहे हैं। लेकिन पहले देखते हैं कि इतना बड़ा रॉकेट ज़मीन पर खड़ा कैसा दिखता है।

0:56रॉकेट की बनावट

लॉन्च पैड पर न्यू ग्लेन एक लंबे, चमकीले स्तंभ जैसा दिखाई देता है। इसका बाहरी शरीर बहुत ऊँचा और चौड़ा है, क्योंकि इसे बहुत सारा ईंधन और भारी सामान उठाना होता है। रॉकेट को कई बड़े हिस्सों में बाँटा जाता है। सबसे नीचे पहला चरण होता है। उसके ऊपर दूसरा चरण। सबसे ऊपर उपग्रह रखने की जगह होती है। इसे पेलोड फेयरिंग कहते हैं। फेयरिंग एक चिकने खोल की तरह उपग्रह को हवा से बचाती है। कल्पना कीजिए कि आपका उपग्रह एक नाज़ुक खिलौना है और फेयरिंग उसका सुरक्षित डिब्बा। न्यू ग्लेन का व्यास लगभग सात मीटर है। यानी इसके अंदर एक छोटी-सी बस आराम से खड़ी हो सकती है। अब सवाल है—इतने बड़े ढाँचे को ऊपर उठाने की ताकत कहाँ से आएगी? इसके लिए हमें रॉकेट के सबसे शक्तिशाली हिस्से, इंजनों के पास जाना होगा।

1:56इंजनों का धक्का

रॉकेट का पहला चरण उसका सबसे ताकतवर धक्का देने वाला हिस्सा है। न्यू ग्लेन के पहले चरण में सात बड़े इंजन लगे होते हैं। ये इंजन ईंधन को जलाकर बहुत गर्म गैस बनाते हैं। गैस नीचे की ओर तेज़ी से निकलती है और रॉकेट ऊपर की ओर धकेला जाता है। इसे क्रिया और प्रतिक्रिया कहते हैं। गुब्बारे से हवा बाहर निकलती है तो गुब्बारा दूसरी दिशा में भागता है, है ना? रॉकेट भी कुछ ऐसा ही करता है, बस बहुत अधिक नियंत्रित और शक्तिशाली ढंग से। पहले चरण के इंजन इतनी ताकत बना सकते हैं कि लाखों किलोग्राम वजन को चलना शुरू करा दें। वाह! लेकिन इंजन को जलने के लिए हवा नहीं चाहिए होती। फिर उसे जलाने वाली चीज़ कहाँ से मिलती है? अब हम ईंधन टैंकों के अंदर झाँकेंगे।

2:55ईंधन के विशाल टैंक

पहले चरण के अंदर दो बड़े टैंक होते हैं। एक में तरल ऑक्सीजन और दूसरे में तरलीकृत प्राकृतिक गैस, यानी बहुत ठंडी मीथेन, रखी जाती है। ऑक्सीजन यहाँ सांस लेने के लिए नहीं, बल्कि ईंधन को जलाने में मदद करने के लिए होती है। अंतरिक्ष में लगभग हवा नहीं होती, इसलिए रॉकेट अपनी ऑक्सीजन साथ लेकर जाता है। दोनों पदार्थ पाइपों से इंजन तक पहुँचते हैं। वहाँ उनका मिश्रण होता है और नियंत्रित दहन से ऊर्जा निकलती है। ये टैंक खाली डिब्बे नहीं हैं। इन्हें बहुत हल्का, फिर भी बेहद मजबूत बनाया जाता है। क्योंकि हर अतिरिक्त किलोग्राम को भी ऊपर ले जाना पड़ता है। रॉकेट विज्ञान में हल्का होना सचमुच बड़ी बात है। लेकिन केवल ईंधन भरने से रॉकेट नहीं उड़ता। लॉन्च के पहले हर वाल्व, सेंसर और कंप्यूटर को भी तैयार होना पड़ता है।

3:49उलटी गिनती शुरू

लॉन्च से पहले रॉकेट की जाँच लगभग एक विशाल पहेली सुलझाने जैसी होती है। कंप्यूटर देखते हैं कि टैंक का दबाव सही है या नहीं, इंजन तैयार हैं या नहीं, और मौसम शांत है या नहीं। तेज़ हवा या बिजली वाले बादल हों, तो टीम इंतज़ार कर सकती है। सुरक्षा हमेशा पहले आती है। उलटी गिनती शुरू होती है—दस, नौ, आठ! फिर इंजन चालू होने लगते हैं। पहले चमकदार लौ दिखाई देती है। उसके बाद धुआँ और भाप फैलते हैं। रॉकेट तुरंत ऊपर नहीं कूदता। कुछ क्षणों तक इंजन अपनी पूरी शक्ति बनाते हैं और प्रणालियाँ अंतिम बार पुष्टि करती हैं कि सब ठीक है। यह ऐसा है जैसे कोई धावक दौड़ने से पहले अपने जूते कसकर बाँधता है। अब असली उठान शुरू होने वाली है, और अगले पल धरती भी हल्की-सी काँपती हुई महसूस हो सकती है।

4:45पहली उड़ान

जैसे ही ऊपर की ओर धक्का रॉकेट के वजन से अधिक हो जाता है, न्यू ग्लेन धीरे-धीरे लॉन्च पैड छोड़ता है। पहले कुछ सेकंड में वह बहुत भारी लगता है, क्योंकि उसे गुरुत्वाकर्षण से लड़ना होता है। नीचे से आग की लंबी चमकदार धारा निकलती है। रॉकेट सीधा ऊपर जाता है, फिर धीरे-धीरे एक मोड़ लेने लगता है। इसे ग्रैविटी टर्न कहा जाता है। यह मोड़ रॉकेट को केवल ऊँचा नहीं, बल्कि आगे भी ले जाता है। याद रखिए, कक्षा तक पहुँचने के लिए आगे की गति बहुत जरूरी है। लगभग हर पल रॉकेट का कंप्यूटर दिशा को थोड़ा-थोड़ा ठीक करता रहता है। इतनी बड़ी मशीन को रास्ते पर रखने का काम सचमुच कमाल का है। लेकिन जैसे-जैसे ईंधन खत्म होता है, पहला चरण अपना काम पूरा करने लगता है। तब एक बड़ा बदलाव आने वाला है।

5:44पहला चरण लौटता

कुछ मिनट बाद पहला चरण अपने टैंकों का अधिकतर ईंधन इस्तेमाल कर चुका होता है। अब उसे साथ ले जाना बेकार वजन बन जाता। इसलिए पहला चरण दूसरे चरण से अलग हो जाता है। इस घटना को स्टेज सेपरेशन कहते हैं। सोचिए, रॉकेट अपनी पुरानी भारी जैकेट उतार रहा है। अलग हुआ पहला चरण तुरंत गायब नहीं होता। न्यू ग्लेन का पहला चरण दोबारा इस्तेमाल के लिए बनाया गया है। वह अपने इंजन और पंख जैसी नियंत्रण सतहों की मदद से पृथ्वी की ओर लौटने का रास्ता पकड़ता है। नीचे समुद्र में एक विशेष तैरता हुआ प्लेटफॉर्म उसका इंतज़ार कर सकता है। सही जगह उतरना बहुत सटीक काम है। उधर ऊपर, हल्का हुआ दूसरा चरण उपग्रह को आगे ले जाता रहता है। अब देखते हैं कि दूसरा चरण क्यों जरूरी है और वह कितनी ऊँचाई तक काम करता है।

6:47दूसरे चरण की ताकत

दूसरा चरण छोटा होता है, पर उसका काम बहुत महत्वपूर्ण है। जब रॉकेट घने वायुमंडल से काफी ऊपर पहुँच जाता है, तब पहला चरण अपना काम पूरा कर चुका होता है। दूसरा चरण अपने इंजनों से उपग्रह को और तेज़ करता है। न्यू ग्लेन के दूसरे चरण में ऐसे इंजन होते हैं जो तरल ऑक्सीजन और तरल हाइड्रोजन का उपयोग करते हैं। यह संयोजन बहुत ऊँचाई पर काम करने के लिए उपयोगी है। दूसरा चरण कई बार इंजन चालू और बंद कर सकता है, ताकि उपग्रह को बिल्कुल सही जगह और सही गति मिल सके। यह कुछ वैसा है जैसे साइकिल चलाते समय आप पहले तेज़ पैडल मारें और फिर धीरे-धीरे ब्रेक लगाकर ठीक निशान पर रुकें। अंतर बस इतना है कि यहाँ निशाना अंतरिक्ष में है! लेकिन उपग्रह अभी भी एक सुरक्षित खोल के अंदर छिपा है। अब उस खोल को हटाने का समय आएगा।

7:45सुरक्षा खोल खुला

ऊपर पहुँचने पर हवा बहुत पतली हो जाती है। अब फेयरिंग की जरूरत नहीं रहती, क्योंकि उपग्रह को तेज़ हवा से बचाने की आवश्यकता समाप्त हो चुकी है। छोटे-छोटे यांत्रिक ताले खुलते हैं और फेयरिंग के दो हिस्से अलग होकर अंतरिक्ष में पीछे छूट जाते हैं। अंदर रखा उपग्रह पहली बार खुले अंतरिक्ष को देखता है। यह पल बहुत सुंदर होता है। फेयरिंग ने लॉन्च के दौरान कंपन, हवा और गर्मी से उपग्रह की रक्षा की थी। एक बड़े रॉकेट की नोक पर वह खोल लगभग किसी अंतरिक्ष हेलमेट जैसा काम करता है। अब उपग्रह साफ दिखाई दे सकता है और उसका आकार भी समझ आता है। कुछ उपग्रह मुड़े हुए सौर पैनल लेकर जाते हैं, जो बाद में खुलकर सूरज की रोशनी से बिजली बनाएँगे। लेकिन उपग्रह को बाहर निकालने से पहले हमें समझना होगा कि कक्षा असल में होती क्या है।

8:45कक्षा का रहस्य

कक्षा को समझने के लिए एक गेंद की कल्पना कीजिए। अगर आप गेंद को सीधा ऊपर फेंकेंगे, तो वह नीचे लौट आएगी। अगर आप उसे बहुत तेज़ आगे फेंकेंगे, तो वह दूर जाकर नीचे गिरेगी। अब सोचिए कि पृथ्वी गोल है और गेंद इतनी तेज़ आगे जा रही है कि जमीन नीचे की ओर मुड़ती रहती है। गेंद गिरती तो है, पर पृथ्वी की सतह से टकराती नहीं। यही कक्षा का सरल विचार है। उपग्रह लगातार पृथ्वी की ओर गिर रहा होता है, लेकिन उसकी आगे की गति उसे पृथ्वी के चारों ओर घुमाती रहती है। यह सुनकर थोड़ा अजीब लगता है, पर यही अंतरिक्ष का शानदार संतुलन है। न्यू ग्लेन का दूसरा चरण उपग्रह को इसी संतुलन के लिए सही गति देता है। वाह, अंतरिक्ष में गिरना भी कभी-कभी घूमने का तरीका बन सकता है! अब देखते हैं उपग्रह सचमुच रॉकेट से अलग कैसे होता है।

9:48उपग्रह की रिहाई

जब दूसरा चरण उपग्रह को सही ऊँचाई और गति तक पहुँचा देता है, तब पेलोड अडैप्टर नाम का छोटा-सा जोड़ उपग्रह को थामे रहता है। आदेश मिलने पर एक सुरक्षित रिलीज़ प्रणाली खुलती है। उपग्रह धीरे से रॉकेट से अलग हो जाता है। कोई धमाका नहीं, कोई तेज़ झटका नहीं—बस एक नियंत्रित धक्का। अंतरिक्ष में हवा नहीं होती, इसलिए उपग्रह आगे बढ़ता रहता है। उसके सौर पैनल खुलते हैं, एंटेना बाहर आते हैं और कंप्यूटर काम शुरू करते हैं। पृथ्वी से भेजे गए संकेत उसकी स्थिति जाँचते हैं। यह सचमुच एक अंतरिक्ष डिलीवरी जैसा है, जिसमें डिब्बा खुलते ही अंदर का यंत्र अपना काम संभाल लेता है। एक ही रॉकेट अलग-अलग उपग्रह भी ले जा सकता है और उन्हें अलग-अलग समय पर छोड़ सकता है। अब सवाल है—ये उपग्रह हमारे लिए करते क्या हैं?

10:48उपग्रहों का काम

उपग्रह अंतरिक्ष में जाकर कई उपयोगी काम करते हैं। मौसम वाले उपग्रह बादलों और तूफानों की तस्वीरें देखते हैं। संचार उपग्रह दूर-दराज़ जगहों तक संदेश और संकेत पहुँचाने में मदद करते हैं। पृथ्वी को देखने वाले उपग्रह जंगलों, समुद्रों और खेतों में हो रहे बदलावों का अध्ययन कर सकते हैं। कुछ उपग्रह नक्शे बनाने और स्थान पता करने में मदद करते हैं। आपके मोबाइल में दिखने वाला मौसम, दूर की तस्वीरें और कई वैज्ञानिक जानकारी उपग्रहों से जुड़ी हो सकती है। एक उपग्रह को सही कक्षा में रखना इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है। अगर वह थोड़ा गलत रास्ते पर चला जाए, तो वह अपने काम की जगह तक नहीं पहुँच पाएगा। अंतरिक्ष में छोटी-सी दिशा-त्रुटि भी बहुत बड़ी दूरी बन सकती है। इसी कारण रॉकेट और उपग्रह को छोड़ने वाली टीम गणित, सेंसर और कंप्यूटर पर बहुत ध्यान देती है। लेकिन क्या रॉकेट की यात्रा उपग्रह छोड़ते ही खत्म हो जाती है?

11:54सभी हिस्सों का काम

उपग्रह के अलग होने के बाद दूसरा चरण भी अपने बचे हुए काम पूरे करता है। वह अपनी स्थिति की जानकारी भेज सकता है और कभी-कभी दूसरे उपग्रहों को छोड़ने के लिए कुछ देर इंतज़ार कर सकता है। फिर मिशन की योजना के अनुसार वह सुरक्षित दिशा में आगे बढ़ता है। इस पूरी यात्रा में रॉकेट का हर हिस्सा अपना खास काम करता है। पहला चरण पृथ्वी के पास भारी उठान करता है। दूसरा चरण ऊपर जाकर सही गति बनाता है। फेयरिंग सुरक्षा देती है। पेलोड अडैप्टर उपग्रह को पकड़ता और छोड़ता है। सेंसर और कंप्यूटर हर कदम पर मदद करते हैं। यह अकेले किसी एक हिस्से का जादू नहीं, बल्कि बहुत सारी टीमों और प्रणालियों का मिलकर काम करना है। न्यू ग्लेन जैसे रॉकेट का लक्ष्य केवल बड़ा दिखना नहीं, बल्कि भारी और अलग-अलग आकार के उपग्रहों को भरोसेमंद ढंग से ले जाना है। अब हम पूरी यात्रा को एक छोटे सारांश में जोड़ेंगे।

13:01पूरी यात्रा सारांश

तो पूरी कहानी कुछ ऐसी है। सबसे नीचे सात इंजन वाला पहला चरण तरल ऑक्सीजन और मीथेन से शक्तिशाली धक्का बनाता है। वह रॉकेट को पृथ्वी के घने वायुमंडल से बाहर ले जाता है। फिर पहला चरण अलग होकर दोबारा उतरने की कोशिश करता है। ऊपर बचा दूसरा चरण तरल ऑक्सीजन और हाइड्रोजन की मदद से गति बढ़ाता है। सही ऊँचाई पर फेयरिंग खुलती है और उपग्रह बाहर दिखाई देता है। फिर रॉकेट उसे इतनी आगे की गति देता है कि वह पृथ्वी के चारों ओर कक्षा में घूम सके। यही कारण है कि उपग्रह को कक्षा तक पहुँचाना केवल ऊपर जाना नहीं, बल्कि ऊपर जाकर सही दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ना है। न्यू ग्लेन एक विशाल अंतरिक्ष लिफ्ट जैसा है, लेकिन इसमें रस्सी नहीं होती—इसमें इंजन, ईंधन, गणित और बहुत सावधानी होती है। अब आखिरी दृश्य में एक मज़ेदार कल्पना और छोटा-सा सुरक्षित विज्ञान-चैलेंज आपका इंतज़ार कर रहा है।

14:07अंतरिक्ष ज्ञान चुनौती

आज आपने सीखा कि न्यू ग्लेन जैसा विशाल रॉकेट कई हिस्सों की टीमवर्क से काम करता है। पहला चरण सात इंजनों से जोरदार धक्का देता है और वापस उतरने के लिए बनाया जा सकता है। दूसरा चरण उपग्रह को बहुत तेज़ आगे बढ़ाता है। फेयरिंग उसे उड़ान के कठिन शुरुआती हिस्से में सुरक्षित रखती है। फिर उपग्रह अलग होकर सौर पैनल खोलता है और पृथ्वी की कक्षा में अपना काम शुरू करता है। सबसे बड़ा wow तथ्य याद रखिए: कक्षा में घूमता उपग्रह लगातार पृथ्वी की ओर गिर रहा होता है, लेकिन उसकी आगे की गति उसे पृथ्वी से टकराने नहीं देती। घर पर एक सुरक्षित कल्पना-चैलेंज आज़माइए। एक कागज़ पर पृथ्वी बनाइए, उसके चारों ओर गोल रेखा खींचिए और परिवार को समझाइए कि सीधा ऊपर जाने और आगे तेज़ जाने में क्या अंतर है। बस कोई चीज़ हवा में मत फेंकिए। इस मज़ेदार तथ्य को परिवार के साथ साझा कीजिए, और अगली बार आसमान देखते हुए सोचिए—शायद ऊपर कोई उपग्रह अपनी शांत अंतरिक्ष-परिक्रमा कर रहा हो।

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